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पार्टी में शामिल हों। यदि वे चाहते हैं तो उन्हें अपनी पार्टी बनाने दिया जाए; लेकिन हम ब्राह्मणों, पूंजीपतियों, भू-स्वामियों और अन्य शोषक वर्गों के विरुद्ध अपने साझे संघर्ष में एक साझा मोर्चा निश्चित तौर पर बना सकते हैं। पार्टी को तोड़कर गैर ब्राह्मणों ने एक तरह से राजनैतिक आत्महत्या कर ली है।
‘‘जहां तक मेरा संबंध है मैं ऐसी किसी आत्मघाती नीति का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं हूं। दलित वर्गों का अपना राजनैतिक संगठन जारी रहेगा।
‘‘कुछ लोग यह शिकायत करते हैं कि दलित वर्गों की एक पष्थक पार्टी का संगठन सामान्य रूप से कार्यकारी वर्गों के हितों को नुकसान पहुंचाएगा।
यह ऐसा कुछ नहीं करेगा। बल्कि इसके विपरीत श्रमिक वर्ग के निम्नतम स्तर से संघठित हमारे संघर्ष का कामगार वर्ग की अन्य सभी श्रेणियों के मेल में सहायक सिद्ध होना तय है।
यदि किसी संरचना में इसके सबसे निचले पत्थर को उसके स्थान से हटाया जाता है तो ऊपर के बाकी पत्थरों का भी अपने स्थान से हिलना तय है। वहीं दूसरी ओर हिंदू जाति का कोई श्रमिक संगठन हिंदुओं की सहायता करेगा यह तय नहीं है।
इसके विपरीत यदि उसको सही दिशा में मार्गदर्शन नहीं मिला तो यह दलित वर्गों के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है। हिंदू जाति का कोई संगठन दलित वर्ग के श्रमिकों के अधिकारों के महत्व को नहीं पहचानता। यह उनके अधिकारों को रौंद भी सकता है जैसाकि विगत में अनेक मामलों में हो चुका है।
एक उदाहरण मेरे इस नजरिए को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होगा। 1929 में बांबे टेक्सटाइल्स मिल में एक लंबी हड़ताल हुई। हड़ताल के दौरान मैंने हड़ताल के नेताओं से हिंदू जाति द्वारा मिलकर कुछ विभागों में कार्य कर रहे दलित वर्गों के व्यक्तियों पर से प्रतिबंध हटाने के लिए कुछ करने को कहा। श्रमिक नेताओं ने इस संबंध में एक सीधा-साधा संकल्प जारी करने और इसे फासेट समिति को अग्रेषित करने के अतिरिक्त महीनों तक मेरे सुझाव पर कोई कार्रवाई नहीं की। पुनश्च, समिति ने भी इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की।
वहीं दूसरी ओर खोती उन्मूलन संबंधी आंदोलन हमारे द्वारा शुरू किया गया। प्रारंभ में यह अभियान दलित वर्गों के हितों के लिए शुरू किया गया था लेकिन यह स्वतः खोती भूमियों पर हिंदू जाति के कार्यकर्ताओं के लिए सहायक सिद्ध हुआ। इस प्रकार के उदाहरण ‘‘अनंतकाल’’ तक सामने आ सकते हैं।