2. 18.1.1928 किसी व्यक्ति का मूल्य स्वतः सिद्ध और स्वस्पष्ट होता है। - Page 27

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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‘‘18 जनवरी, 1928 को नासिक के नजदीक त्रयम्बक (जिसको हिन्दू तीर्थ स्थान मानते हैं) में एक महान संत चोखा मेला के नाम से मंदिर बनाने के प्रस्ताव पर चर्चा के लिए दलित समाज ने एक सभा आयोजित की। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को सभा की अध्यक्षता करने को विषेषतया आंमत्रित किया गया था। सर्वश्री बी. के गायकवाड़, भालेराव, पंजाजी, नवसाजी जाधव आदि ने सभा को संबोधित किया। इन के साथ-साथ नासिक से श्री दातार शास्त्री, ‘‘स्वराज्य’’ के संपादक श्री मराठे व श्री वाडेकर और जलगाँव से श्री थोरात व श्री चौधरी ने जन समूह को संबोधित किया’’। ख्1,

पूर्ण चर्चा के बाद इस सभा में निर्णय लिया गया कि एक महान संत का सच्चा स्मारक छुआछूत के धब्बे को पूर्ण उत्साह से समाज से मिटाना, एक मंदिर के निर्माण से कहीं बढ़कर है। वास्तविकता यह थी कि एक तो डॉ. अम्बेडकर अपने अर्न्तमन विचार से सवर्ण व अछूतों के लिऐ अलग-अलग मंदिरों के विरोध में थे दूसरे भवन निर्माण का भारी व्यय एक वित्तीय बोझ था और तीसरे डॉ. अम्बेडकर एक मूर्ति पूजक न होकर वस्तु की उपयोगिता में कहीं अधिक आस्था रखते थे।

डॉ. अम्बेडकर के विचार में, सन् 1300 से 1600 के काल में महाराष्ट्र के भागवत धर्म के प्रचारक रहे संत कवियों ने कभी भी खुल कर जाति प्रथा के विरुद्ध प्रचार नहीं किया। जाति प्रथा सामाजिक असमानता पर आधारित है व सामाजिक अन्याय को प्रोत्साहन देती है, क्योंकि जाति प्रथा एक जाति पर दूसरी जाति के अधिपत्य पर आधारित है। इन संत कवियों के प्रयास एक ब्राह्मण व एक शूद्र को समानता के दर्जे पर लाने के नहीं रहे बल्कि एक ब्राह्मण को एक हरि उपासक शूद्र में समानता लाने तक सीमित रहे। इस प्रयास में सन्त सफल हुए और ब्राह्मणों को उपासकों का वर्चस्व स्वीकारना पड़ा चाहे उपासक किसी भी जाति से रहा हो। सबसे अन्त में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अध्यक्षीय भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि संतों के प्रयास का समाज पर ‘‘जाति प्रथा के सम्पूर्ण विनाश के मामले में कोई प्रभाव नहीं हुआ। समाज के लिए मनुष्य का मूल्य उसकी समाज के लिए

1 ‘‘बहिष्कृत भारत’’, 3 फरवरी, 1928