74. 18/19.7.1942 यदि लोकतंत्र समाप्त होता है, तो यह हमारा विनाश होगा। - Page 263

242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संभावनाएं क्या हैं? यह बेहतर होगा यदि मैं उन शक्तियों का ब्यौरा दूं जो हमारी सहायता कर रही हैं और उन शक्तियों का भी जो हमारे विरुद्ध कार्य कर रही हैं। ऐसी शक्तियां की जानकारी से आप अपनी नीतियां बनाने और अपने समर्थन को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने के संबंध में बेहतर ढंग से सक्षम हो सकेंगे।

मैं आपको इस बात से बताना प्रारंभ करता हूं कि मेरी राजनीति का प्रमुख आधार क्या है। हो सकता है कि आप इससे परिचित हों लेकिन इसे दोबारा बताना अच्छा रहेगा। मेरी राजनीति का आधार इस प्रस्ताव में निहित है कि अछूत हिंदुओं के कोई उपशीर्ष अथवा उप-वर्ग नहीं हैं, वे भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक पृथक और अलग तत्व और उतने ही अलग और पृथक जितने कि मुसलमान हैं और भारत के मुसलमानों के समान ही अछूतों को भी भारत के हिंदुओं की तुलना में पृथक राजनीतिक अधिकारों का हक है। यही मेरी राजनीति का मुख्य बिंदु है। कोई भी व्यक्ति जो इस बात को अपने दिमाग में रखेगा वह मुझे अथवा मेरी राजनीति को गलत नहीं समझेगा। अपनी राजनीति का मूल आधार बताने के पश्चात मैं उन शक्तियों के बारे में या विरोध में ब्यौरा दूंगा जो हमारे पृथक राजनीतिक अधिकारों के दावे के संबध में हमारे पक्ष में या विरोध में कार्य कर रही हैं। शुरूआत गोलमेल सम्मेलन से करते हैं। गोलमेज सम्मेलन एक बहुत बड़ी बात थी, और वहां जो कुछ भी हुआ उन सब बातों का ब्यौरा देकर आपको परेशान नहीं करना चाहता। मैं केवल इस बात तक ही सीमित रहूंगा कि वहां अछूतों के संबंध में क्या हुआ। वहां मेरे और श्री गांधी के बीच में एक बहस हुई। श्री गांधी ने कहा कि अछूत हिंदुओं का एक उप-वर्ग हैं, परिणामतः यदि ब्रिटिश लोगों के हाथ से कोई शक्ति निकलनी है तो वह हिंदुओं के पास अविभाजित रूप से आनी चाहिए जिन पर अछूतों के हितों की देखभाल करने के लिए विश्वास किया जा सकता था। मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई स्थिति पूर्णतः भिन्न थी; मैंने कहा कि अछूत देश के जीवन में एक पृथक और अलग तत्व हैं। हिंदू जोकि हमारे परंपरागत शत्रु हैं उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता और राजनैतिक शक्ति को उनके के उत्थान के लिए उपयोग करना तो दूर की बात है बल्कि वे इसका उपयोग अपने लाभ के लिए करेंगे और ऐसा ही था। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक था कि अछूतों और हिंदुओं के बीच राजनैतिक विभाजन होना चाहिए ताकि अछूतों को राजनीतिक शक्ति उनके हाथों में प्राप्त हो जाए जिसका उपयोग वे अपने कल्याण के लिए कर सकें अथवा जिसका उपयोग वे अपने आपको हिंदुओं की निरंकुशता और दमन से बचाने के लिए कर सकें। मैं उस बात को विस्तार से नहीं बताना चाहता कि महात्मा अथवा अन्य हिंदुओं ने हमारे दावे को परास्त करने के लिए क्या किया। यह कहना पर्याप्त है कि गोलमेज सम्मेलन में अछूत जीत गए और महात्मा हार गया। सांप्रदायिक पंचाट इसी बहस