74. 18/19.7.1942 यदि लोकतंत्र समाप्त होता है, तो यह हमारा विनाश होगा। - Page 264

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का परिणाम था। इसका बड़ा लाभ इस तथ्य में निहित है कि अछूतों को भारत के राष्ट्रीय जीवन में महत्व मिला और पृथक राजनीतिक अधिकारों का दावा करने की हकदारी भी मिली। सांप्रदायिक पंचाट का यही महत्व है।

श्री गांधी ने प्रारंभ में इस सांप्रदायिक पंचाट को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया ताकि वे एक निर्णीत मुद्दे को पुनः उलझाने के लिए ब्रिटिश सरकार को बाध्य कर सकें। अपने अनशन में भी वह उसी तरीके से असफल हुए जैसे कि वे गोलमेज सम्मेलन में हुए थे, जहां पर वे अछूतों के हिंदुओं से अलग एक पृथक तत्व के रूप में माने जाने और पृथक राजनीतिक महत्व प्राप्त करने के दावे को परास्त कर पाने में सफल नहीं हो पाए थे। पूना समझौत में जो उनके अनशन का परिणाम था, उनको वह बात माननी पड़ी जो मैंने गोलमेज सम्मेलन में सामने रखी थी।

पहले दौर में विजय अछूतों की हुई। लड़ाई के शुरू हो जाने और भारतीय राजनीति में कांग्रेस द्वारा एक खास स्थिति प्राप्त कर लेने के बावजूद हमारी स्थिति सुदृढ़ रहीं। वास्तव में वायसराय द्वारा 8 अगस्त, 1940 को की गई घोषणा के द्वारा हमारे दावे को मजबूती प्राप्त हुई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि भारत के राष्ट्रीय जीवन में मुसलमान और अछूत पृथक और अलग तत्व हैं और यह से ब्रिटिश सरकार ऐसे किसी संविधान को लागू नहीं करेगी जिसमें मुसलमानों और दलित वर्गों का समर्थन प्राप्त न हो।

मैंने अब तक अपनी स्थिति की मजबूती के बारे में बताया है। अब मैं उन शक्तियों के बारे में बताऊंगा जिनकी मंशा हमारी स्थिति को कमजोर करने की है। गांधी और गांधीवाद वह विषाक्त तथ्य है जो हमारी स्थिति को कमजोर करने के लिए कार्य कर रहा है। पूना समझौते पर हस्ताक्षर करके मैंने श्री गांधी की जान बचाने में सहायता की। लेकिन श्री गांधी ने पूना समझौते को एक ऐसे सज्जन व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया था जो किसी समझौते पर अपने वचन का सम्मान करने के लिए हस्ताक्षर करता हो, बल्कि एक ऐसे चतुर व्यक्ति के रूप में हस्ताक्षर किए थे जो किसी कठिनाई से निकलने का रास्ता ढूंढ़ रहा हो। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि श्री गांधी ने उन्हें मृत्यु से बचाने के बावजूद पूना समझौते अछूतों में निर्धारित सिद्वांत को कभी सच्ची और ईमानदार स्वीकृति नहीं दी। वे हरिजनों के पृथक राजनैतिक महत्व संबंधी दावे के एक प्रबल प्रतिद्वंदी बने रहे और तब से उन्होंने हमारे दावे के विरोध और हमारी स्थिति को कम करने के लिए प्रत्येक संभव कार्य किया। मैं चाहता हूं कि आप अपने मन में यह बात बैठा लें कि श्री गांधी