244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हमारे सबसे बड़े विरोधी हैं। पर्याप्त औचित्य होने के बावजूद भी मैं शत्रु शब्द का उपयोग करना पसंद नहीं करता हूं। हममें से कुछ लोग ऐसे हैं जो उनकी कृत्रिम बातों में फंस गए हैं। लेकिन मैं आपको इस बात से आगाह करना चाहूंगा कि यदि आप इस तथ्य पर ध्यान देना भूल जाते हैं कि उन प्रतिकूल शक्तियों, जो आपके पक्ष को कमजोर कर रही हों और जिनके विरुद्व आपको राजनीतिक स्वतंत्रता का अपना युद्व जीतने के लिए ध्यान संकेन्द्रित करना है, में सर्वाधिक अजेय शक्ति गांधी हैं, तो आप सबसे बड़ी गलती कर रहे हैं।
दूसरा कारक जिसने कि आपकी स्थिति को कमजोर किया है निश्चित तौर पर हिज मेजेस्टी की सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन है। 8 अगस्त, 1940 की घोषणा तक हिजमेजेस्टी की सरकार का दृष्टिकोण यह था कि अछूत विशेष और पृथक तत्व हैं और वे इतने महत्वपूर्ण तत्व हैं कि संविधान में किसी भी परिवर्त,न जो वांछित हों को करने के लिए उनकी सहमति जरूरी है। लेकिन स्ट्रैफर्ड के साथ भेजे गए हिज मेजेस्टी की सरकार के प्रस्तावों में हिज मेजेस्टी की सरकार ने अपना रुख बिल्कुल पलट दिया है। क्योंकि सर स्ट्रैफर्ड क्रिप्स ने बिना किसी शर्म अथवा पश्चाताप के यह घोषणा की कि क्रिप्स प्रस्तावों में शामिल संवैधानिक परिवर्तनों को प्रभावी बनाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों की सहमति पर्याप्त थी; और यह कि हरिजनों की सहमति आवश्यक नहीं थी। सीधे शब्दों में अछूतों को भारत के राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण तत्व के रूप में नहीं माना जाता है। यह किसी की भी समझ से बाहर की बात है कि किस प्रकार से कुछ महीनों में ही 60 से 70 मिलियन अछूत महत्वपूर्ण तत्व नहीं रह गए। हिजमेजेस्टी सरकार ने इस प्रकार से एक पूर्ण पलटी मारी है। यह अछूतों के साथ बड़ा धोखा है। हिजमेजेस्टी सरकार के इस अन्यायपूर्ण और अभद्र कार्य का कारण चाहे कुछ भी हो और आपकी भावनाएं कितनी भी मजबूत क्यों न हों, इस तथ्य को पहचाना जाना चाहिए कि यह हमारी लड़ाई में सबसे बड़ा धोखा है। किसी प्रतिकूल चरित्र की एक तीसरी परिस्थिति भी है, जिसकी ओर मैं आपका ध्यान अवश्य दिलाना चाहूंगा। एक समय था जब भारत में विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के बीच हित समुदाय पर आधारित एकता की भावना थी, जिनमें मुसलमान समुदाय एक प्रमुख समुदाय था। यह एकता अब समाप्त हो चुकी है। ऐसा मुख्य रूप से मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमान समुदाय के दृष्टिकोण में लाए गए परिवर्तन के कारण हुआ है। वर्ष 1937 के चुनाव के पश्चात जब श्री जिन्ना ने मुस्लिम लीग को पुनर्जीवित किया था तो वह इस विचारधारा के साथ प्रारंभ हुई थी कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, और एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में उन्हें अपनी सहायता और अस्तित्व के लिए अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की शक्ति की आवश्यकता थी। पारस्परिक शक्ति की योजना में मुस्लिम लीग का विश्वास इतना दृढ़ था कि मुस्लिम