74. 18/19.7.1942 यदि लोकतंत्र समाप्त होता है, तो यह हमारा विनाश होगा। - Page 268

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जिसकी कि आशंका हो, को नियंत्रित कर सकते हैं और केवल वे ही सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों मेंं नए स्वागतयोग्य परिवर्तन लागू कर सकते हैं। अछूतों को इस बात का आग्रह करना चाहिए कि उनके प्रतिनिधियों को इन प्रमुख स्थितियों में रखा जाए। इस बार इसे किसी समझ अथवा परंपरा के ऊपर नहीं छोड़ना है। हिंदुओं पर उनकी जबान का पक्का होने का विश्वास नहीं किया जा सकता। आपको यह निश्चित तौर पर देखना होगा कि इस संबंध में कोई प्रावधान संविधान का हिस्सा बनाया जाए।

इसके पश्चात अंतिम मांग आती है जिस पर अछूतों को अवश्य बल देना चाहिए। यह अंतिम अवश्य है लेकिन किसी भी प्रकार से महत्व में कम नहीं है। वास्तव में मुझे तो विश्वास है कि यह सबसे महत्वपूर्ण मांग है जो मेरे अनुसार अन्य सभी मांगों से बढ़कर है। मेरा आशय अछूतों की नई बस्तियों की परियोजना का है जोकि हिंदू गांवों से अलग और स्वतंत्र हों। अछूतों इतने हजारों वर्ष से हिंदुओं के गुलाम और दास क्यों रहे हैं? मेरी समझ से इसका उत्तर हिंदू गांवों के विचित्र संगठन में निहित है। आप देखेंगे कि पूरे भारत में लगभग 7 लाख हिंदू गांव फैले हुए हैं और प्रत्येक हिंदू गांव से जुड़ी हुई अछूतों की एक छोटी सी बस्ती है। अछूतों की यह बस्ती आमतौर पर जनसंख्या की दृष्टि से उस हिंदू गांव, जिससे कि यह जुड़ी हुई है, से तुलनात्मक रूप से बहुत छोटी है। दूसरे, अछूतों की यह बस्ती आर्थिक रूप से संसाधनहीन है और इसमें सुधार के कोई अवसर भी नहीं है। यह बस्ती अपरिहार्य रूप से भूमिहीन आबादी की होती है। अछूत होने के नाते यह कुछ भी बेच नहीं सकती, क्योंकि कोई भी किसी अछूत से कुछ नहीं खरीदेगा। यह पूर्ण रूप से ऐसी आबादी है, जो निराश्रय और अपनी आजीविका के लिए हिंदू गांव पर आश्रित है। यह अपना जीवनयापन भोजन मांगकर अथवा थोड़ी सी मजदूरी पर अपना श्रम देकर करती है। आप अच्छी तरह से यह समझ सकते हैं कि ऐसी किसी स्थापना में अछूत इतनी शताब्दियों से खराब स्थिति में क्यों रहे। हिंदू गांव की तुलना में अछूत किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं कर सकते। संख्या में वे कम और आर्थिक दृष्टिकोण से गरीब हैं। यदि यह गांव प्रणाली अपनी वर्तमान रूप में जारी रहती है तो अछूत कभी भी स्वतंत्रता नहीं प्राप्त कर पाएंगे चाहे वह सामाजिक हो, अथवा आर्थिक और कभी भी हीनता की उस भावना से नहीं निकल पाएंगे जो उन्होंने अपनी सामाजिक और आर्थिक निर्भरता की अवस्था के परिणामस्वरूप पाई है। इसलिए इस गांव प्रणाली को तोड़ना ही होगा। यदि अछूत वास्तव में अपने आपको हिंदुओं के प्रभुत्व से मुक्त कराना चाहते हैं जो उन्होंने उस गांव प्रणाली के माध्यम से बना रखा है तो यही एकमात्र रास्ता है जो उनके लिए खुला है। मेरा सुझाव है कि आपको संविधान में अछूतों के लिए स्वतंत्र और विशिष्ट नए गांवों को बनाने के लिए व्यवस्था किए जाने