2. 18.1.1928 किसी व्यक्ति का मूल्य स्वतः सिद्ध और स्वस्पष्ट होता है। - Page 28

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सर्वविदित व सर्वसिद्ध उपयोगिता है जो प्रकट व प्रत्यक्ष होकर रहती है और यह कोई भक्ति का मुलम्मा नहीं है। संतों ने यह सच्चाई समझाने के लिए संघर्ष नहीं किया। इसके विपरीत उनके संघर्ष का दलित समाज पर बड़ा हानिकारक प्रभाव पड़ा। इससे ब्राह्मणों को एक कुतर्क मिल गया कि तुम भी चोखामेला की ऊंचाई को छू लो तो ब्राह्मण तुम्हारा भी आदर करेंगे। यह दलितों का मुंह बन्द करने में अचूक था। डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, क्योंकि हिन्दू धर्म के अलग-अलग पंथों के अनुयायी अपनी जातीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित धारणाओं से ओत-प्रोत थे उन्होंने सामाजिक समानता, न्याय प्रियता, बन्धुत्व व मानव प्रेम से केवल मुंह ही नहीं मोड़े रखा, बल्कि झूठी मनगढंत उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया और भ्रम फैलाया।

जहां तक रामदास पंथ का प्रश्न है, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि प्रारम्भ से ही उनके अनुयायी और उनके संस्थापक जातीय पूर्वाग्रहों से ग्रस्त व बदनाम थे व ब्राह्ममणों की वरिष्ठता मानने जैसे विचारों से प्रभावित थे। रामदास के अनुसार स्वर्ग में व पृथ्वी पर भी एक पतित ब्राह्मण भी दूसरी जातियों के लोगों से श्रेष्ठ है, इतना ही नहीं ब्राह्मण को तो देवता भी नमन करते हैं। ख्2,

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