8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
| ,d | Col2 |
|---|
| ; | ks) |
|---|
| d | qy |
|---|
3
भारतीय बहिष्कृत समाज सेवक संघ के संरक्षण में रत्नागिरी जिला बहिष्कृत परिषद द्वारा आयोजित सभा का दूसरा अधिवेशन डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में शनिवार 13 अप्रैल, 1927 को 4ः30 शाम चिपलून में हुआ। देवराव नायक ‘‘समता’’ के संपादक, एस.एन. शिवतरकर, डी.वी. प्रधान, एस.एस. गुप्ते, बी.आर. काडरेकर भी सम्मेलन में उपस्थित रहे। कोई आठ हजार पुरुष व स्त्रियां अधिवेशन में पहुंचे। ख्1,
अधिवेशन के समय तनाव की स्थिति थी। अधिवेशन हेतु पण्डाल लगाने की जगह पाने के लिए कठिन प्रयास करना पड़ा। सनातन पंथी हिन्दुओं के मन में भय था कि महाड़ कांड कहीं दोहराया न जाए और अगर सम्मेलन उनके कस्बे में हुआ तो अछूत हिन्दू उनके पानी को दूषित कर सकते हैं। इसलिए, उन्होंने बड़े ध्यान, सावधानी व सुरक्षा से सारे कुएं बन्द कर दिए थे मानों कुछ दुश्मन लोग उन पर हमला बोल रहे हों। डॉ. अम्बेडकर और उनके सहकर्मी चिपलून के डाक बंगले में दो दिन ठहरे थे।
प्रगतिशील विचारधारा के लोग जैसे विनायक राव बर्वे और बी.जी. खाटू दो स्थानीय नेताओं ने भी अधिवेशन में उपस्थिति दर्ज कराई। ओम स्वामी रागजी ने अधिवेशन में आये प्रतिनिधियों का अभिनंदन किया और सवर्ण हिन्दुओं को आशा जताई कि मौके की नजाकत को समझते हुए वे अपने दृष्टिकोण में खुलापन लाने की आवश्यकता को समझें।
अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘तुम्हें अपनी दासता का समापन स्वयं करना होगा, अपने आत्म सम्मान को बेचकर जीना कलंकित हो कर जीने के समान है। जीवित रहने के लिए आत्म सम्मान एक आवश्यक टानिक है। बिना आत्म सम्मान के मनुष्य शून्य मात्र है। आत्म सम्मान से जीने के लिए अपनी कठिनाइयों पर आप को काबू पाना होगा। कड़े परिश्रम व निरंतर संघर्ष से ही आपको शक्ति, आत्मविश्वास व मान्यता मिलेगी’’ तब उन्होंने कोंकण में परिचालित भूमि व्यवस्था जिसे ‘खोती’ कहते थे, के बारे में चर्चा की। खोती व्यवस्था के अंतर्गत उनका
- ‘‘बहिकृष्त भारत’’, 3 मई, 1929