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खून चूसा जा रहा था और डॉ. अम्बेडकर ने उनको आश्वासन दिलाया कि वे पूरा प्रयास करेंगे और खोती व्यवस्था से उन्हें हमेशा के लिए मुक्ति दिलवाएंगे। उन्होंने इसके लिए कोई भी खतरा झेलने को तैयार हैं की घोषणा की। यदि मैं यहां आप की दरिद्रता व लज्जित जीवन के प्रति आपको जागरूक करता हूं तो मुझे जान से मारने की धमकी मिलेगी। मनुष्य का शरीर नश्वर है। हर एक को एक दिन तो मरना ही है, परन्तु हम यह प्रण करें कि अपना मनुष्य जीवन सुधारने व आत्म सम्मान जैसे उत्तम आदर्शां के लिए समर्पित कर देंगे। हम किसी के दास नहीं हैं। हम योद्धाओं के कुल से हैं। किसी शक्तिशाली व्यक्ति के लिए अपना आत्मसम्मान खोकर और बिना स्वदेश प्रेम के जीवन जीने से बड़ा कोई अपमान नहीं हो सकता’’।
‘‘तब डॉ. बाबा साहेब ने सुझाव दिया ‘‘क्यों न हमारे लोग पलायन कर किसी अच्छे व दूरस्थ स्थान पर जाकर बस जाएं। यह सवर्ण हिन्दुओं व हिन्दू जागीरदारों व जमींदारों के अत्याचारों से बचने का एक उपाय हो सकता है।’’ उन्होंने कहा कि वे सिंध व इंदौर राज्यों में कुछ कृषि भूमि लेने का प्रयास करेंगे। उन्होंने अपने पड़ोसी मुसलमानों का उदाहरण देते हुए बताया कि वे अफ्रीका देश जाकर बस गये थे और पैसा कमाकर व धनाढय बनकर कोंकण में वापिस आ गये। सम्भवतः पलायन व और कहीं जा बसने का विचार उनके मन में तब आया जब वे दूसरे पार्षदों के साथ सक्कर बांध का परीक्षण करने सिंध गए थे, जिसके अन्तर्गत हजारों एकड़ रेगिस्तान की भूमि को उपजाऊ कृषि क्षेत्र में विकसित करने की आशा थी इसी प्रकार इंदौर के महाराजा के साथ उनका नया अनुबंध हुआ था इसलिए उनमें शायद यह आशा जगी कि वे महाराजा से अछूतों के लिए कुछ भूमि लेने में सफल होंगे।
श्री विनायक बर्वे ने रात्रि भोज के लिए डॉ. अम्बेडकर को सप्रेम आमंत्रित किया था। वे इस भोज में इस मान्यता के साथ सम्मिलित हुए कि ‘‘किसी को भी ऐसे अंतर्जातीय भोज में भागीदार बनना चाहिए, इसलिए नहीं कि अगर कोई ब्राह्मणों के संग भोजन कर लेगा तो उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाएंगे बल्कि ऐसा करना इसलिए उत्तम है, क्योंकि ऐसे भोजों से सामाजिक मेल जोल बनता है, आपसी संबंधों में समरसता आती है और समानता के सिद्धान्त को बढ़ावा मिलता है।’’ ख्2,
2 कीर, पृष्ठ सं. 127 - 128