80. 23.8.1942 मैं चाहता हूं, शासन की लगाम आपके हाथ में हो। - Page 305

284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समता और संप्रभुता की। जब तक हम यह स्थिति प्राप्त नहीं करेंगे; हमें चापलूसी और दासता की पुरानी स्थिति में धकेला जाता रहेगा।’’

इससे पहले, डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की थी कि ‘‘उन्हें किसी पद का मोह नहीं है, और यदि उन्होंने देखा कि उनके समाज की नियति बेहतर करने के उनके प्रयास सफल नहीं हुए हैं, तो पुनः वे अपना पूर्ववत् काम करने को विवश होंगे।’’ ख्1,

बहरहाल, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के भाषण में उस विषय के और भी आयाम थे जिसे ‘द इंडियन स्टेट्स’ ने रिपोर्ट किया था। वे आयाम थेः

डॉ. अम्बेडकर ने अपने समाज की ओर से चलाए गए अपने आंदोलन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि ‘गोलमेज सम्मेलन’ में उन्होंने दावा किया था कि दलित वर्ग हिंदुओं के उपवर्ग नहीं हैं बल्कि उनकी अपनी महत्वपूर्ण पृथक पहचान है। उनके दावे पर महात्मा गांधी ने विवाद किया था, जो अंततः उस द्वंद्व में हार गए थे।

साम्प्रदायिक अवार्ड दलित वर्ग को पृथक पहचान देने वाला अधिकार-पत्र था। अतः गांधी जी ने उपवास करके दूसरी बार इस प्रश्न को उठाया था। तब पूना समझौता हुआ और उसमें भी वह अपने समाज की अलग पहचान कायम रखने में पुनः सफल रहे।

तीसरी महत्वपूर्ण घटना ब्रिटिश सरकार के अगस्त प्रस्ताव की थी, जिसमें यह स्पष्ट कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार को भारत के लिए कोई भी संविधान, दलित वर्ग की सम्मति और सहमति के बिना, स्वीकार्य नहीं होगा। ख्2,

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12 दि बंबई क्रानिकल, 24 अगस्त, 1942 दि इंडिया स्टेट्स, 12 सितंबर, 1942