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जब 3 नवम्बर, 1942 की सुबह भारत सरकार के श्रम सदस्य डॉ. बी.आर. अम्बेडकर फ्रंटियर मेल से बम्बई पहुंचे तो वहाँ एक विशाल भीड़ ने जिसमें ज्यादातर दलित वर्ग के सदस्य थे, बम्बई सेंट्रल स्टेशन को वास्तव में घेर लिया था।
माल्यार्पण समारोह संपन्न होने के पश्चात् डॉ. अम्बेडकर दादर स्थित अपने निवास पर चले गए, जहां एक दूसरा जनसमूह उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था।
समझा जाता है कि डॉ. अम्बेडकर 10 नवम्बर को महाड़ के लिए रवाना हो जाएंगे और वहां से तीन दिन बाद लौटेंगे। ख्1,
‘‘8 नवम्बर, 1942 अर्थात् रविवार की शाम कामगार मैदान परेल; बम्बई में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन के तत्वावधान में आयोजित एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए भारत सरकार के श्रम सदस्य माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भारत में वर्तमान नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए गांधी जी और कांग्रेस को दोषी माना था और उसके बारे में उन्होंने कहा था कि विशेषतः सर स्णफर्ड क्रिप्स की पेशकश की दृष्टि से इसका किंचित भी औचित्य नहीं है। वर्तमान अव्यवस्था से, जो भाड़े के लोगों द्वारा की गई है, ब्रिटिश सरकार या अंग्रेजों को कोई नुकसान या क्ष्ति नहीं होगी बल्कि स्वयं भारतीयों का अहित होगा। देश के विशाल और महत्वपूर्ण वर्ग इस आंदोलन के पक्ष में नहीं हैं और उन्हें कोई शक नहीं है कि यह विफल होगा।
जहां तक दलित वर्गों का संबंध है, उन्होंने आंदोलन में कोई भाग नहीं लिया था और वे ले भी नहीं सकते थे। कांग्रेस के नेता मुस्लिमों को राजी करने के लिए बहुत आतुर थे। उन्होंने समझौता करने के लिए मुस्लिम नेताओं से अनेकों बार संपर्क किया था; उन्होंने देश के भावी संविधान में उचित स्थान की दलित वर्ग की मांग की अब तक उपेक्षा की है। कांग्रेस मुसलमानों को साथ लेना चाहती थी क्योंकि मुस्लिम ताकतवर और संगठित थे। दलित वर्ग की उपेक्षा की गई थी क्योंकि वे पर्याप्त
1 दि बंबई क्रानिकल, 4 नवंबर, 1942