290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गांधी जी की राजनीति निःसंदेह बहुत उत्तेजक रही है। लेकिन एक चीज बिल्कुल निश्चित है कि गोखले और रानाडे की राजनीति और कार्यशैली देश को बंटवारे की वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में कभी नहीं ले जाती। श्री गांधी की राजनीति के कारण यह त्रासदी पैदा हुई। डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि स्वराज पाने और इस एकमात्र प्रश्न पर चर्चा करने के अलावा इस सफर के अंत में हमें पूरी तरह जिन भिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है गोखले और रानाडे संभवतः उन्हें उत्पन्न नहीं होने देते।
डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा कि ’भारत के लोग गांधी जी और कांग्रेस आला कमान में अंधविश्वास रखते हैं। वे आलोचनापरक गुण को पूरी तरह खो चुके हैं और उनमें कभी भी इतना साहस नहीं रहा कि वे गांधी जी को बता सकें कि वह कहां गलत हैं।’
क्रिप्स प्रस्तावों पर कांग्रेस की अस्वीकृति का हवाला देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि प्रस्तावों के बारे में चाहे जो भी कहा गया हो, जहां तक भविष्य का संबंध है, क्रिप्स प्रस्तावों ने कांग्रेस को शतप्रतिशत वह व्यवस्था दी जो वह चाहती थी। उन प्रस्तावों में संविधान का प्रारूप तय करने के लिए एक संविधान सभा की व्यवस्था है और उस सभा को यह भी विकल्प दिया है कि वह डोमिनियन प्रास्थिति अपना ले या स्वाधीनता ले ले। तत्काल शासन के बारे में प्रस्तावों में इतनी विस्तृत व्यवस्था दी गई थी जितनी युद्धजनित परिस्थितियों में हो सकती थी। रक्षा एकमात्र ऐसा विषय था, जिसे आरक्षित रखा गया और शेष विषय हस्तांतरित कर दिए गए।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘राजनीति का नौसिखिया भी समझ लेता कि एक तरफ 15 सदस्य और दूसरी तरफ केवल रक्षा सदस्य तो यह संघर्ष रक्षा सदस्य के लिए, एक अत्यंत असमान द्वंद्व होता। इसके अलावा, कोइ्र भी समझदार आदमी वर्तमान प्रस्तावों के बजाय, भविष्य विषयक प्रस्तावों की अधिक परवाह करता। यदि भविष्य विषयक प्रस्ताव राष्ट्र को पूर्णं प्राधिकार देते तो कोई भी समझदार आदमी उन्हें इसलिए अस्वीकार नहीं करता कि उनमें कुछ कमी है, जो प्रत्यक्ष वर्तमान के संबंध में है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि रक्षा ही स्वतंत्रता हासिल करने का एकमात्र उपाय है।
अनूसूचित जाति के लोगों से अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन में शामिल हाने की अपील करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि जिस स्थिति में वे हैं, उसी में रखे जाने पर इन्हें अपने हितों की रक्षा के लिए अपने आपको संगठित करना होगा। जब भारत के नये संविधान का प्रारूप तैयार किया जाए, तो उन्हें राजनीतिक