86. 10.5.1943 श्रमिकों के हाथों में स्वराज आ सकता है। - Page 314

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10 मई, 1943 (सोमवार) की शाम इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर की बम्बई प्रेजिडेन्सी कमेटी द्वारा अपने सम्मान में दी गई चाय पार्टी में माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्रम सदस्य, भारत सरकार ने भारत में वर्तमान श्रमिक आंदोलन की नितांत

खोखली और सतही स्थिति की निंदा की।

मणिबेन कारा ने डॉ. अम्बेडकर का स्वागत किया और कहा कि खेद की बात है कि श्रमिक आंदोलन में फूट पड़ गई है। उन्होंने श्रम सदस्य के पद की बागडोर संभालने के बाद थोड़े ही समय में डॉ. अम्बेडकर द्वारा किए गए सुधारवादी कार्यों की सराहना की।

प्रत्युत्तर में डॉ. अम्बेडकर ने वहां उपस्थित श्रमिक नेताओं को सलाह दी कि वे अपने मतभेद भुलाकर पूंजीवाद के खिलाफ एक संगठित मोर्चा बनाएं।

डॉ. अम्बेडकर ने ब्रिटेन में श्रमिक आंदोलन की प्रगति का हवाला दिया और बताया कि उसने, हमेशा से प्रभावी टोरियों से सत्ता हथिया कर शासन की बागडोर दो बार कैसे कब्जे में ले लिया था।

यह भारतीय श्रमिक आंदोलन के लिए उस जैसी चेष्टा करने का एक उदाहरण था।

उन्होंने आग्रह किया कि ब्रिटिश लेबर पार्टी के मॉडल पर इस देश में ‘यूनाइटेड लेबर पार्टी’ बनाने की जरूरत है।

अंत में, डॉ. अम्बेडकर ने यह भी कहा कि यदि इंगलैंड में लोकतंत्र असफल रहा तो इसका कारण यह था कि वहां की सत्ता, टोरियों के हाथ में थी। अतः महत्व इस बात का है कि स्वराज किनके हाथ में होना चाहिए।

उन्होंने भारत में श्रमिक नेताओं को उद्वेलित किया कि वे यह देखें, कि जब इस देश में स्वराज आए तो वह भारतीय श्रमिकों के हाथ में हो। ख्1,

1 द बम्बई क्रानिकल, 11 मई, 1943