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अनुसूचित जातियों को हिंदुत्व त्यागना चाहिए
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31 जनवरी, 1944 को कानपुर में आयोजित अनुसूचित जाति सम्मेलन में प्रस्ताव पारित होने के पश्चात्, तीन अनुसूचित जाति संगठनों के स्वागत भाषणों का उत्तर देते हुए, डॉ. अम्बेडकर ने भावी भारत में अपने समाज की भूमिका का उल्लेख किया और युवकों से फेडरेशन के लिए संगठनात्मक शक्ति लगाकर पाबंदियों को मिटाने की अपील की ताकि कोई पार्टी यहां तक कि ब्रिटिश सरकार भी, भारत के संवैधानिक विकास की भावी योजना में उनके महत्व को नकारने का साहस न कर सके।
डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की- ‘‘हम संकल्प करें कि, भविष्य के स्वतंत्र भारत में हम शासन करने वाली कौम होंगे। हम पराधीनता की भूमिका जारी रखने और ऐसी स्थिति स्वीकार करने से इंकार करते हैं, जिसमें हमें दास माना जाए न कि मालिक।’’
उन्होंने दावा किया कि यदि जब भी भारत में स्वराज सरकार बने तो भारत में तीन पक्ष- हिं, मुस्लिम और अनुसूचित जातियां, राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदार हों।
उन्होंने उस दिन की कल्पना की जब 30 रुपए प्रतिमास की न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान, श्रमिकों के लिए मकान तथा गरीबो को बीमे के रूप में वृद्धावस्था पेंशन की गारंटी देना संभव होगा।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि जो लोग मुझसे कांग्रेस में शामिल होने के लिए कहते हैं, उन आलोचकों को मेरा आसान जवाब है- ‘‘मैं भारत में अनुसूचित जातियों की स्वतंत्रता को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूं। ये जातियां 2000 वर्षों से यातना और दमन की शिकार रही हैं।’’ इसलिए वे देश के लिए स्वराज के बजाय अपने समाज के उत्थान के लिए काम करना पसंद करते थे।
डॉ. अम्बेडकर ने लोगों से कहा कि वे 2000 वर्षों के लम्बे समय से कष्ट भोगने वाले कारणों के बारे में सोचें। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म इसका मुख्य कारण है। पूरे विश्व में सभी धर्मों में केवल हिंदू धर्म ऐसा है, जो जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता