296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को मानता है। सवर्ण जाति के हिंदुओं द्वारा अनुसूचित जातियों पर किए गए समस्त अन्यायों के लिए यही एक आवरण, एक आड़ है। उन्होंने खेदपूर्वक कहा कि आज भी स्थिति यही है कि गांवों में, वे आत्म-सम्मान के साथ नहीं जी सकते।
इसलिए उन्होंने अपना दृढ़संकल्प पुनः दोहराया कि वे हिंदू धर्म का परित्याग करें और अब आगे अपमान बर्दाश्त न करें।
उन्हें सबसे अधिक जो बात खलती थी वह यह थी कि उनके समाज के लोग आज भी अपमान की स्थिति को स्वीकार करते हैं, क्योंकि सवर्ण हिंदू लोग उन पर बराबर हावी रहते हैं। उन्होंने लोगों को प्रेरित किया कि वे अपनी शक्ति पर भरोसा रखें, इस धारणा को मिटा दें कि वे किसी भी दूसरे समुदाय से किसी भी तरह हीन हैं।
इसके आगे डॉ. अम्बेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि उनके राजनीतिक संगठन, अनुसूचित जाति फेडरेशन के पीछे संगठनात्मक बल द्वारा दंड-विधान बनाने की जरूरत है। उनहोंने कहा कि ब्रिटिश सरकार मुसलमानों के पक्ष में विचार करने के लिए सदैव तैयार है। यदि कांग्रेस नेता जेल से रिहा होने के बाद, पाकिस्तान के बारे में मुस्लिमों के साथ किसी व्यवस्था या 50-50 के आधार पर समझौता कर लेते हैं, तो अनुसूचित जातियों की स्थिति क्या होगी? यदि उन्हें राजनीतिक सत्ता में भागीदार बनना है तो उन्हें एक ठोस इकाई के रूप में संगठित होना होगा, तभी वे देश के भावी शासन में अपने उचित अधिकारों की लड़ाई में सफल हो सकेंगे।
स्त्रियों के योगदान के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने विचार प्रकट किया कि उनका आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उनकी स्त्रियां इसमें तेजी लाने में सक्रिय होकर मदद नहीं करेंगी। इसके बाद एक वक्ता ने कहा कि उन्होंने सम्मेलन का संदेश फैलाने के लिए प्रत्येक गाँव और शहर में स्वयंसेवी कोर बनाने और संदेश को शहरों से 200 मील की दूरी तक के गाँवों में ले जाने को सबसे अधिक महत्व दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब वे दूसरों से अस्पृश्यता मिटाने की मांग करते हैं तो उन्हें अनुसूचित जातियों में आंतरिक भेदभाव को मिटाने के अपने उत्तरदायित्व को समझना होगा।
सम्मेलन का समापन करते हुए श्री शिवराज ने, डॉ. अम्बेडकर द्वारा अपने सम्मान के लिए की गई सेवाओं की प्रशंसा में लगाए गए नारों के बीच, उस दो दिवसीय सत्र की समाप्ति की घोषणा की। ख्1,
1 द फ्री प्रेस जर्नल, 1 फरवरी, 1944