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अनुसूचित जातियों के समक्ष प्रश्न है-‘अभी या कभी नहीं’
26 अगस्त, 1944 की रात को कलकत्ता में कई अनुसूचित जाति संगठनों
द्वारा प्रस्तुत अभिनन्दन भाषण का उत्तर देते हुए, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्रम सदस्य,
वायसराय कार्यकारी परिषद ने कहा- अनुसूचित जातियों के समक्ष प्रश्न है ‘अभी
या कभी नहीं’।
डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुसार, भारत एक
‘डोमिनियन’ बन जाएगा। डोमिनियन में निहित मूलभूत तत्वों में से एक तत्व यह है
कि उसके पश्चात् भारतीय संविधान के निर्माण में महामहिम सम्राट को हस्तक्षेप करने
का कोई अधिकार नहीं होगा। इसलिए, जो भी कमियाँ अनुसूचित जातियों के लिए
हो सकती हैं, उन्हें यदि पूरा नहीं किया गया, तो उन्हें भारत में अपनी राजनीतिक
मांग सफलतापूर्वक पेश करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा। इसलिए प्रश्न है- ‘अभी
या कभी नहीं’। कारण, उन्होंने महसूस किया था कि, उनकी विजय निकट है और
वह अब केवल एकता चाहते थे।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि गांधी जी का पूरा जीवन, उनकी राजनीतिक
गतिधियां और राजनीतिक रणनीति, अल्पसंख्यकों की मांगों की अनदेखी की ओर
इंगित करती हैं। नागरिक अवज्ञा आंदोलन, नमक कानून तोड़ना आदि ये सारे
तमाशे‘’ जो गांधी जी कर रहे थे, इनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं था। अब गांधी
जी समझ गए हैं कि अल्पसंख्यकों की मांगों की अनदेखी करना संभव नहीं है और
यह भी कि उन्हें सिखों और मुसलमानों के साथ संधि करनी होगी। डॉ. बी.आर.
अम्बेडकर ने कहा, लेकिन अनुसूचित जाति समुदाय की मांगों को मानने की उनमें
कोई इच्छा नहीं। अनुसूचित जाति के लोग कमजोर हैं, लेकिन विधाता ने हमेशा
उनकी मदद की है। ‘‘आप भली प्रकार कल्पना कर सकते हैं यदि क्रिप्स मिशन
कामयाब हो जाता तो कितनी विपदा आती। मैं हर रोज ईश्वर का धन्यवाद करता
हूं कि वह मिशन विफल रहा।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि, वायसराय ने गांधी जी के साथ हाल के
पत्र व्यवहार में यह मूलभूत शर्त रखी थी कि ब्रिटिश से भारतीय लोगों के हाथ में
सत्ता हस्तांतरण के लिए हिंदुओं और मुसलमानों के बीच समझौते मात्र से काम नहीं