90. 20.9.1944 दलित वर्ग हिंदू समाज का अंग नहीं है। - Page 322

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स्वराज सरकार आए वह ऐसी सरकार हो जिसमें हिंदू, मुस्लिम और अनुसूचित जातियाँ सभी संप्रभुता के वारिस हों।

...........ऐसा प्रतीत होता है कि श्री गांधी की नीति, जो देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से ताकत ग्रहण करती है, ब्रिटिश सरकार को सूचित करना और अनुसूचित जातियों की मांगें मंजूर कराये बिना, उसे अपनी बात मनवाने के लिए बाध्य करना है। अल्पसंख्यकों की समस्या उठने के समय से, श्री गांधी का अपने राजनीतिक जीवन में संपूर्णं उद्देश्य केवल एक रहा है और वह है अनुसूचित जातियों की उपेक्षा करना, उन्हें अनदेखा करना। इस विषय में श्री गांधी की युक्तियों का मुझे बहुत दुखद अनुभव रहा है।’’

डॉ. अम्बेडकर ने बताया कि गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने उन्हें अलग-थलग करने, उनके प्रयासों के हर प्रकार के समर्थन को काटने की कोशिश की । हर बार गांधी नाकाम रहे, किंतु आखिर में उन्होंने एक युक्ति अपनाई। मुझे यह कहते हुए अफसोस है कि कोई भी ईमानदार आदमी उसका इस्तेमाल नहीं करेगा। उन्होंने मुसलमानों से संपर्क किया और उन्हें बताया कि वह श्री जिन्ना के 14 बिंदुओं को मानने के लिए तैयार हैं बशर्तें कि मुस्लिम इन गंदे कुत्तों, अछूतों का समर्थन न करने के लिए राजी हो जाएं।

डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि उनके पास एक समझौता है जो गोलमेज सम्मेलन में गांधी और मुस्लिमों के बीच तैयार हुआ था। सौभाग्यवश, मुस्लिमों में कुछ शर्म बाकी थी और उन्होंने गांधी का समर्थन नहीं किया। ख्3,

बहरहाल, डॉ. अम्बेडकर के मानपत्र में और भी बहुत सी बातें थीं जो टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुई थीं। वे प्रश्न निम्न प्रकार थे। (सम्पादक)

‘‘वह ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट बताना चाहते थे कि वास्तविक राष्ट्रीय सरकार वह होगी जो हिंदुओं, मुस्लिमों और अनुसूचित वर्गों से मिलकर बनेगी। दलित वर्ग हिंदू समाज के अंग नहीं हैं बल्कि उनका एक अलग राष्ट्र है। दलित वर्ग अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आंदोलन करने और लड़ाई लड़ने के लिए तेयार हैं।

डॉ. अम्बेडकर ने अपने समाज के लोगों को चेतावनी दी कि उनके रास्ते में भारी अड़चनें हैं। श्री गांधी और हिंदुओं ने सरकार में पर्याप्त भागीदारी की मुस्लिमों की मांगें मान हैं, जबकि दलित वर्ग द्वारा रखी गई उसी प्रकार की मांग उन्होंने स्वीकार नहीं की।

3 हैदराबाद बुलेटिन, 20 सितंबर, 1944 पुनर्मुद्रित, मारिल्ल चन्द्र, पृष्ठ 63-65