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युद्धकाल में बनाए हैं। उदाहरण के लिए, औध़ोगिक विवादों में अनिवार्य मध्यस्थता का प्रावधान है। अब तक भारत सरकार को कामगारों के रोजगार के निबंधन और शर्तें विहित करने का कोई प्राधिकार नहीं था। यह हर व्यक्ति का निजी मामला था। यह रोजगार की मजदूरी और शर्तें तय करने के लिए कामगार और नियोजक के बीच निजी करार से अधिक कुछ नहीं था। आज हमारे यहां कानून है जिसके अनुसार, यदि भारत सरकार को संतोष हो जाता है कि रोजगार के निबंधन और शर्तें संतोषजनक नहीं हैं, तो वह ऐसे नियम और शर्तें अधिरोपित कर सकती हैं, जिन्हें वह ठीक और उचित समझे। हालांकि यह विधान, युद्ध की देन है, फिर भी आशा है यह युद्ध के बाद भी समाप्त नहीं होगा और यह इस देश में विधि व्यवस्था का स्थायी अंग होगा (करतल ध्वनि)। जो कुछ हमने किया है हम जानते हैं वह वास्तव में कम है। लेकिन मैं चाहता हूं कि जनता यह समझ ले कि भारत सरकार कानून के मामले में बहुत संतोषप्रद स्थिति में नहीं है।
‘‘पहले तो, अधिकांश श्रम कानून लिखित हैं, इस पर प्रांतों का प्राधिकार और न्याय क्षेत्र है इसलिए प्रांत ही श्रम विधान बना सकते हैं। भारत सरकार को यह प्राधिकार, विधान की समवर्ती सूची से मिला है। आप सब जानते हैं कि हालांकि भारत सरकार को श्रम विधान पारित करने के लिए समवर्ती अधिकार दिया गया है फिर भी भारत शासन अधिनियम में एक निश्चित प्रावधान (उपबन्ध) है कि चाहे विधान प्रांतीय प्राधिकार से लाया गया हो अथवा केंद्रीय विधायिका के समवर्ती अधिकार क्षेत्र से, श्रम विधान का प्रशासन पूरी तरह प्रांतीय सरकार के हाथ में है। परिणामस्वरूप........... जब भारत सरकार सोचती है कि वह वि़धायन की समवर्ती शक्तियों के माध्यम से विधान बनाए तो ऐसा करने से पहले उसे प्रांतीय सरकारों से परामर्श करना होता है। आखिरकार जब विधान पारित हो जाता है तो उसका कार्यान्वयन प्रांतीय सरकार को करना होता है। इसलिए जब तक भारत सरकार प्रांतीय की पूर्व सम्मति न ले ले, तब तक उन विधानों को पारित करने का कोई उपयोग नहीं है, जिन पर प्रशासनिक निकाय दृष्टिपात करने को तैयार नहीं है। ये हैं हमारी कठिनाइयां। लेकिन मैं कहूंगा और आश्वासन दूंगा कि सरकार पत्थर का दिल नहीं रखती। वह तेज गति से काम करती है और श्रमिक मामलों में पुनर्गठन की सोच रही है। (तालियां)
‘‘बहुत से लोग भारत सरकार की आलोचना करते हैं और मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा करना ठीक है? हो सकता है, भारत सरकार ने ज्यादा न किया हो, लेकिन क्या इससे अंतर पड़ता है? मेरे विचार में भी ऐसा प्रतीत होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। आखिरकार, सवाल यह है, क्या नई भारत सरकार ने कुछ