91. 20.9.1944 मैं राष्ट्रवाद का विरोधी नहीं हूं, किंतु .... - Page 328

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रूप में सामने आया है। मेरे विचार में, मुझे यह सवाल नहीं उठाना चाहिए कि, क्या हर देश स्वशासन के लिए हकदार नहीं है, बल्कि हमें यह पूछना चाहिए कि क्या किसी देश में शासक वर्ग में उत्तरदायित्व की भावना है ताकि उस देश की सरकार, उस समाज को सौंपी जा सके। हम इस बात को भूल गए हैं कि शासन करने के अधिकार का फैसला वास्तव में शासक वर्ग में उत्तरदायित्व के प्रकाश में तय होना चाहिए। आखिरकार, यदि शासक वर्ग को शासन करना है, तो सवाल यह है कि उस शासक वर्ग का दृष्टिकोण क्या है, विचारधारा क्या है, उसे किसमें विश्वास है। यदि आपका शासक वर्ग ऐसा है जो इस बात में विश्वास रखता है, जिसे आप श्रेणीबद्ध असमानता समझते हें, जो उस दूसरे के ऊपर आसीन है जिसे असमानता में विश्वास नहीं है, और बल्कि उसे इस बात में विश्वास है कि वह आदमी आदमी नहीं है, उसे स्पर्श न किया जाए और यह कि अमुक वर्ग ही शिक्षा और संपत्ति के लिए हकदार है, दूसरे नहीं। दूसरे केवल सेवा करने के लिए ही पैदा होते हैं और वे सेवा करते-करते मर जाते हैं। यही वह सवाल हैं, जो मैं पूछता हूं। यदि राष्ट्रीय सरकार बनी और यदि वह शासक वर्ग के हाथ में चली गई, तो क्या आप वाकई में सोचते हैं कि राष्ट्र की सरकार वर्तमान, भारत सरकार से बेहतर काम करेगी?

मैं राष्ट्रीय सरकार का विरोधी नहीं हूं, मैं स्वराज का विरोधी नहीं हूं। मैं स्वाधीनता का विरोधी नहीं हूं। यदि मुझे यह आश्वासन दिया जाए कि मुझे स्वाधीनता, शिक्षा और कल्याण सुलभ होंगे, जिनका राष्ट्र से वायदा किया गया है तो मैं निश्चय ही स्वाधीनता के लिए, राष्ट्रवाद के लिए, स्वतंत्रता के लिए लड़ुंगा (हर्षध्वनि और करतल ध्वनि)। लेकिन यदि इन लंबी-लंबी बातों, वृहत विचारधारा के बाद कुछ और नहीं हुआ तो हम इसे ‘एक टांग पर नाचना’ कहेंगे यदि वह शासक वर्ग तक ही सीमित रहता है। और यदि राजनीतिक सत्ता का उपयोग उस वर्ग को सबल बनाने के लिए किया जाता है, तथा दूसरों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है, तो हो सकता है वर्तमान भारत सरकार की उतनी आलोचना न हो, जितनी अब हो रही है। (जोरदार करतल ध्वनि)..............’’। ख्1, [*]

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1 द लिबरेटर 24.9.1944, भारत सरकार द्वारा किए गए सुधारों के बारे में डॉ. अम्बेडकर का नागरिक उद्बोधन

* उद्बोधन में ‘लिबरेटर’ की टिप्पणियों के लिए देखिए- परिशिष्ट- III