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हमारी 1/3 जनता देशी राजाओं के राज में रहती हैं, जहां कोई कानून व्यवस्था नहीं है, जहां हर चीज राजा के निजी प्राधिकार और मनमर्जी से होती है। गोलमेज सम्मेलन में लिए गए फैसलों में से एक फैसला यह था कि देशी रियासतों को अखिल भारतीय परिसंघ के संधटकों में से एक संघटक के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। बड़ा मसला यह था कि क्या देशी रियासतों प्रतिनिधि स्वयं जनता द्वारा निर्वाचित होने चाहिए अथवा वे राजाओं द्वारा नामित होने चाहिए। यह एक बड़ा मसला था जिस पर बहुत दिनांं तक एक लंबा विवाद चलता रहा। संभवतः आपमें से कुछ लोगों की यह धारणा हो कि इस तरह के मुद्दे पर जो महत्वपूर्ण है, जो इतना मार्मिक है, और मैं कहना चाहूंगा जो श्री गांधी को, उनके अनुरूप, इतना प्रिय है, श्री गांधी का क्या दृष्टिकोण होगा? आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि श्री गांधी स्वयं उन राजाओं के पास चलकर गए थे और सम्मेलन में रियासतों के प्रतिनिधियों को नामित किया गया था। मैं अकेला व्यक्ति था - गोलमेज सम्मेलन का अकेला सदस्य जिसने इस मुद्दे पर शुरू से लेकर अंत तक लड़ाई लड़ी (करतल ध्वनि)। यहां तक कि राइट ऑनरेबल शास्त्री भी - मैं आपको इस वृद्ध आदमी के बारे मे बहुत मजाकिया कहानियां सुनाऊंगा (आवाजें आईं - हम सुनकर प्रसन्न होंगे) हम सब फेडरेशन के खिलाफ थे। शुरू से अंत तक मैं इस बात पर सर्वथा कायम रहा कि ब्रिटिश इंडिया की राजनीति को भारतीय रियासतों की राजनीति में न मिलाएं। ब्रिटिश भारत खासकर 150 से भी अधिक वर्षों से देशी भारत से पृथक रही है। बेशक, हमारी नियति एक ही है। फिर भी तथ्य यही है कि ब्रिटिश भारत में हमने एक भिन्न मार्ग पर यात्रा की है। देशी रियासतें एक भिन्न मार्ग पर चल रही हैं। हमें एक भिन्न प्रकार की राजनीति अर्थात् शिक्षा प्राप्त है जो उन्हें प्राप्त नहीं है।
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देशी रियासतों की समस्या
हमें विभिन्न राजनीतिक परम्पराएँ विरासत में मिली हैं, और इसीलिए मैं हमेशा इस बात का आग्रह करता रहा कि ब्रिटिश भारत को देशी रियासतों के साथ मिलाकर उसकी नियति को जटिल बनाने के बजाय ब्रिटिश भारत को राजनीतिक उद्धार के मार्ग पर चलने दिया जाए। राइट ऑनरेबल शास्त्री हमारे ‘सहकर्मी’ थे, या ‘षड्यंत्रकारी’? हम केवल तीन थे - सर चिंतामणि, श्रीनिवास शास्त्री और मैं, जो दिल से ब्रिटिश भारत से जुड़े हुए थे। हम उन्हें (शास्त्री को) एक शानदार आदमी होने के नाते चैम्पियन मानते थे जो मेरे जैसे युवक से कहीं अधिक सम्मानित व्यक्ति थे। समापन सत्र में उनके भाषण से एक दिन पहले, मैं और चिंतामणि उन्हें यह जानने के लिए लंच पर ले गए थे कि क्या उनके मन में अब भी कड़वाहट है। हमने पाया कि हां, ऐसा है। जब राइट ऑनरेबल शास्त्री 3.00 बजे बोलने वाले थे तो हम जर्मी स्ट्रीट