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था। भाषण देने के बाद और मिथ्या क्षमा याचना करने के बाद मैं वहाँ, कुछ देर तक रहा और फिर सम्मेलन छोड़कर चला गया। पूरे लंदन में मैं ही अकेला व्यक्ति था जो शाम तक यह जानने के लिए बैठा इंतजार करता रहा कि गांधी जी ने क्या बोला है। ठीक आधी रात के समय, सम्मेलन की कार्यवाहियों की रिपोर्ट मेरे पास पहुंची। जब मैंने डाकिये द्वारा दिया गया पैकेट खोला तो मैंने गांधी के भाषण का पहला ही वाक्य देखा जिसमें लिखा था, ‘‘मेरा दिल डॉ. अम्बेडकर के साथ है, लेकिन मेरा दिमाग उनके साथ नहीं है।’’ उन्होंने उस हर चीज का विरोध किया जो, मैंने अपने भाषण में सुझायी थी। मैं बहुत क्रोधित था और वास्तव में मुझे बुखार हो गया। हालांकि सुबह के समय मुझे बुखार नहीं था (शर्म, शर्म के चीत्कार)। मैं अगले दिन प्रातः सम्मेलन में गया। श्री गांधी और दूसरे लोग वहां उपस्थित थे। जैसे ही कार्यवाही का शुभारंभ हुआ, मैंने बीच में लार्ड चांसलर से कहा कि कार्यवाही प्रारंभ होने से पहले मुझे श्री गांधी से कुछ सवाल पूछने की इजाजत दी जाए। मेरे और श्री गांधी के बीच झगड़े का यही कारण रहा है। मैंने श्री गांधी से तीन सवाल पूछे। पहला सवाल था, क्या उन्हें इस कथन के समर्थन में कांग्रेस से प्राधिकार मिला है कि वह नामांकन द्वारा देशी राजाओं के प्रतिनिधित्व का स्वागत करेंगे और क्या इस विषय पर कांग्रेस में कभी विचार-विमर्श हुआ है, क्या कांग्रेस ने कोई संकल्प पारित किए हैं तथा क्या वह कुछ करने के लिए अधिकृत हैं। दूसरा प्रश्न अप्रत्यक्ष चुनाव के बारे में था - कन्जर्वेटिव पार्टी अप्रत्यक्ष चुनाव करवाने को तत्पर थीं। लेकिन हम सब इससे असहमत थे। मैंने गांधी जी से पूछा क्या यह बात नहीं है कि अप्रत्यक्ष चुनाव का यह सिद्धांत श्रीमती एनी बीसेन्ट द्वारा तैयार किए गए स्वराज विधेयक में लाया गया था, जिसे कांग्रेस द्वारा इसी कारण अस्वीकार कर दिया गया था। अगला सवाल मुझे इस समय याद नहीं है। लार्ड चांसलर ने श्री गांधी से मुखातिब होकर पूछा-आपका क्या जवाब है? श्री गांधी ने कोई भी जवाब देने से इंकार कर दिया।
यदि अतीत को बेच दिया गया है, यदि भारत को नीचा देखना पड़ा है तो मेरे कारण नहीं, अनुसूचित जातियों के कारण नहीं, यह श्री गांधी के कारण हुआ। श्री शास्त्री और अन्य लोगों के कारण हुआ है।
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आइए, आयरलैंड की स्थिति की चर्चा करें और यह बताएँ कि देश की एकता की दिशा में 1916 में अंतिम प्रयास कैसे हुआ था। उन्होंने दक्षिणी आयरिश कैथोलिक का प्रतिनिधित्व करने वाले श्री रेडमंड और आयरिश नेता सर एडवर्ड कारसन के बीच हुई बातचीत का और उस उत्तर का हवाला दिया जो कारसन ने रेडमंड को