316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तब दिया था जब रेडमंड ने कारसन से पूछा था कि वह जैसे चाहे रक्षोपाय मांग लें। उनका उत्तर था - ‘‘आपके रखोपायों को लानत, क्योंकि मैं आपके द्वारा शासित होना नहीं चाहता हूं।’’ मैं अपने हिंदू बंधुओं को बताना चाहता हूं कि भारत में हमारे पास श्री कारसन का दृष्टिकोण अपनाने के हजारों बहाने हैं। हम हिंदुओं को यह बताने के लिए न्याय से बंधे हैं कि, ‘‘आपके रक्षोपायों को लानत, हम आपका शासन नहीं चाहते।’’ लेकिन क्या हमने ऐसा कहा था? या हमने ऐसा कहा है? नहीं, हमने ऐसा नहीं कहा है, हालांकि हमारे पास ऐसा कहने का हर अधिकार और हर औचित्य है। हमने अपनी भूमिका अधिक विनम्र होकर निभाई है। हमने कहा है, ‘‘यदि आप वैसा होम रूल (स्वराज) चाहते हैं जैसा हिंदू महासभा के अध्यक्ष ने कहा है, तो वह होम रूप से अधिक कुछ नहीं होगा।’’फिर भी हमारा दिल बहुत बड़ा है, क्योंकि हम संपूर्ण देश के हित को समझते हैं। हमने कहा कि आप होम रूल चाहते हैं तो आप ले लें हम आपका समर्थन करेंगे। एक छोटी सी हमारी शर्त है जिस पर हम कायम हैं और वह शर्त है; हमें उचित रक्षोपाय दे दें। यह दृष्टिकोण कारसन द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण से कहीं ज्यादा उत्तम है।
मैं श्री शास्त्री, श्री गांधी या किसी कांग्रेसी राजनेता से यह पूछना चाहूंगा कि क्या यह दृष्टिकोण देशभक्तिपूर्ण नहीं है? क्या यह श्रेष्ठ मानसिकता नहीं है अथवा क्या यह उदारतापूर्ण नहीं है? हम ब्राह्मणों के शासन को कैसे भुला रहे हैं जिसमें 2000 वर्षों से हम इस आशा में कष्ट भोग रहे हैं कि यदि हमें रक्षोपाय दिए गए तो हम देश में अन्य उदारवादी तत्वों की मदद से एक ऐसी व्यवस्था स्थापित कर लेंगे जिसमें यह देश तरक्की करके पूर्ण पौरुष और राष्ट्रवाद ग्रहण कर लेगा। क्या आप इससे अधिक उदारता और अधिक उत्कृष्ट भावना की आशा करते हैं, जो हमने इस सब राजनीतिक संवाद में प्रदर्शित की है। इसलिए मैं अपने हिंदू बंधुओं को यह बताना चाहूंगा कि बेहतर होगा कि वे अपनी मानसिकता बदलें और उन बलिदानों को जो हम दे सकते हैं, उन जोखिमों को ध्यान में रखें जो हम उठाने को तैयार हैं। आइए, हम समझौता करें और इस मसले को सुलझाएं। मैं इस पर सहमति के लिए बिल्कुल इच्छुक हूं और तैयार हूं। लेकिन दुर्भाग्यवश, मुझे हिंदू समुदाय की ओर से समुचित प्रतिक्रिया नहीं मिली है। जब भी हमने अपना सर उठाया, उन्होंने हर बार तिरस्कार किया।
मुझे याद है कि जब 1932 में अनुसूचित जातियों का सवाल उठा था और उसे उसी स्तर पर रखा गया था जिस पर मुस्लिमों के सवाल को रखा गया था और जब कभी वयस्क मताधिकार समिति ने विभिन्न प्रांतों में अनुसूचित जातियों के लोगों की संख्या का पता लगाने का प्रयास किया तो मैंने देखा समस्त हिंदुओं, उदार