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एवं कट्टर विशाल हृदय सभी ने एक साथ साजिश करके उस समिति को बताया
कि हमारे देश में दलित या अनुसूचित वर्ग जैसी कोई चीज नहीं है (शर्म, शर्म के
नारे), उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और दूसरे स्थानों पर भी यही बात दुहराई गई।
क्यों? जवाब बहुत आसान है। हमारे हिंदू बंधु यह समझ गए कि महामहित सम्राट
की सरकार ने विधायिका में अनुसूचित वर्गों को पृथक प्रतिनिधित्व देने का फैसला
किया है और यह कि प्रतिनिधित्व की मात्रा अनुसूचित जातियों पर निर्भर करेगी, और
चूंकि ये महामहिम सम्राट की सरकार की परियोजना को विफल नहीं कर सके, तो
उन्होंने यह कहकर कि कोई अनुसूचित जातियां नहीं हैं, इस परियोजना को विफल
करने के लिए भूमिगत तरीके अपनाने शुरू कर दिए। इस प्रकार की रणनीति, एक
घटिया रणनीति हिंदुओं द्वारा 1932 में अपनाई गई थी। आज मैं देखता हूं कि हिंदू
एक अन्य प्रकार की रणनीति अपना रहे हैं।
मैंने सभी का ध्यान गांधी - वेवेल पत्राचार, विशेषकर 15 जुलाई, 1944 के
एक पत्र की ओर आकृष्ट किया। वह पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण और आलोचनात्मक था।
वायसराय ने उस पत्र में लिखा था कि जब महामहिम सम्राट की सरकार भारत को
युद्ध की समाप्ति पर स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए तैयार है, तब महामहिम सम्राट
की सरकार ने एक बात का आग्रह किया था कि ऐसा संविधान अस्तित्व में आएगा
जिस पर उन सबकी सहमति होगी जो भारत के राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण संघटक
कहे जाते हैं। वायसराय ने भी इसमें योगदान दिया और उन्होंने खासतौर पर बताया
कि महत्वपूर्ण संघटक कौन-कौन हैं। हमारे लिए सौभाग्य से और हमारे हिंदू बंधुओं
के लिए दुर्भाग्य से, मैंने बताया कि अनुसूचित जातियां भारत के राष्ट्रीय जीवन में
एक महत्वपूर्ण संघटक हैं। (करतल ध्वनि)
मैंने प्रेस के कुछ वर्गों में छपे विवाद का भी हवाला दिया कि वायसराय
का यह कथन नया है और यह उन प्रस्तावों से अलग है, जो महामहिम सम्राट की
सरकार की ओर से सर स्टेफर्ड क्रिप्स द्वारा प्रस्तुत किए गए थे। इसी बात ने मुझे
खिन्न कर दिया था और मैं मिथ्या और द्वेषपूर्ण प्रचार को नहीं समझ सका था।
मैंने हिंदू पत्रकारों और संपादकों से अंततः कहा कि वे स्वयं उन बातों से सर्वथा
परिचित रहें जो वे करते हैं, इस तथ्य को जानें और फिर जो चाहे आलोचना शुरू
करें। मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि साइमन कमीशन ने अनुसूचित जातियों
को पृथक प्रतिनिधित्व देने की जरूरत पर बल दिया है। क्या कोई कह सकता