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बहुत परेशान हूं कि यदि गांधी जी श्री जिना को उनके हक से ज्यादा कुछ देते हैं तो वह अधिक चीज मेरे हिस्से की होगी जो दूसरे के पास चली जाएगी। इसलिए आप भली प्रकार समझ सकते हैं कि मैं उनकी वार्ता के बारे में इतना क्यों चिंतित हूं। श्री गांधी की सबसे महत्वपूर्ण नीति है कि इस देश में सबसे बड़ी पार्टी की मदद प्राप्त करके कांग्रेस के लिए किसी भी तरह शक्ति हासिल की जाए। और ब्रिटिश सरकार को दबाकर, अनुसूचित जातियों की मांग मंजूर करने के लिए राजी हुए बिना, उसे शर्तें मानने को बाध्य किया जाए।
श्री गांधी ने साम्प्रदायिक समस्या के समय से अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में केवल एक चीज की है और वह है अनुसूचित जातियों की उपेक्षा (शर्म, शर्म के नारे) उनसे बचने के लिए और उन्हें हां के तहां छोड़ने के लिए। इस संबंध में मैंने श्री गांधी की चालों के अपने दुःखद अनुभव का हवाला दिया। गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी ने मुझे अलग-थलग करने की कोशिश की थी। मैं हिटलर की भाषा का इस्तेमाल नहीं करने जा रहा हूं कि वह मुझे घेर रहे थे (हर्ष ध्वनि) जो एक बेहतर शब्द है। हालांकि उन्होंने मुझे अकेला कर दिया था और वह हर प्रकार की सहायता ठुकरा दी थी जो अनुसूचित जातियों की ओर से मैंने पेश की थी। वह लंबे अर्से तक नाकाम रहे और अन्ततोगत्वा उन्होंने ऐसे हथियार का इस्तेमाल किया जिसे, मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है, कोई भी ईमानदार आदमी इस्तेमाल नहीं करता। वह मुसलमानों के पास गए और उन्होंने श्री जिन्ना को बताया कि वह उनकी 14 मांगें मानने को तैयार हैं। केवल एक मुद्दे पर रियायत ली। श्री जिन्ना को बताया गया कि वह अछूतों के इस गंदे कुत्ते की बात न मानें। मेरे पास एक दस्तावेज है जो गोलमेज सम्मेलन के समय मुस्लिम लीग और श्री गांधी के बीच बनाया गया था। मैं बिना अधिकार के नहीं बोल रहा हूं। हमारा सौभाग्य है कि मुस्लिमों में लज्जा और पश्चाताप की कुछ भावना थी। मुझे आशा है और विश्वास है कि उन्होंने (श्री गांधी ने) श्री जिन्ना से अपनी मुलाकात के मौके पर इसकी कोशिश नहीं की थी।
आप लोग समझ लें, हमारा उद्देश्य क्या है! हमारा उद्देश्य और आकांक्षा एक शासक समुदाय जाति की है। आप सब लोग इस बात को मन में बैठा लें और आप लोग अपने घरों की दीवारों पर लिख दें ताकि आप रोजाना यह याद रख सकें कि हमारी आकांक्षाएं और हमारा लक्ष्य कोई मामूली स्वरूप का लक्ष्य नहीं है। यह अब तक के हमारे लक्ष्यों में से सबसे बड़ा लक्ष्य है। देखना यह है कि हमें एक शासक जाति के रूप में माना जाए। यदि आप यह महसूस करते हैं तो आप मानेंगे कि इसे कार्यरूप देने के लिए हमें कितने भारी प्रयास करने होंगे। मात्र शब्दों से काम नहीं बनेगा, मात्र संकल्पों से लक्ष्य पूरा नहीं होगा। हो सकता है श्री गांधी इसे झांसापट्टी