93. 24.9.1944 मैं भारत के देश भक्तों से बहुत आगे था। - Page 341

320 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानकर दरकिनार कर दें। हमें श्री गांधी और महामहिम सम्राट की सरकार दोनों के सामने सिद्ध करना होगा और मैं दोहराता हूं; इस महामहिम सम्राट की सरकार से भी हमारा अभिप्राय है बिजनेस अर्थात् प्रयोजन (सुनो, सुनो)। पूरी तरह उद्देश्य की बात और महामहिम सम्राट से अपने उद्देश्य की मांग करेंगे। हम किसी को संकोच नहीं करने देंगे। जब महामहिम सम्राट की सरकार कोई वचन देती है तो हम आशा करेंगे कि महामहिम सम्राट की सरकार उस वचन का सम्मान करे। महामहिम सम्राट की सरकार की सद्-इच्छा पर निर्भर रहने का कोई लाभ नहीं है और न ही स्वयं अच्छाई पर निर्भर रहने का कोई फायदा है। हमें अपनी सामर्थ्य बढ़ानी होगी। हमें दूसरे लक्ष्यों को एक तरफ हटाना होगा।

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‘‘कदाचित मेरे इस शहर में आने पर यहाँ अनुसूचित जातियां में जोश की तीव्र लहर दिखाई दे रही है। आप स्थानीय रीति से और स्थानीय भावना से अपनी स्थानीय गतिविधियों को चलाकर कभी सबल नहीं बन सकते। आप सबको एक ध्वज के नीचे, एक संगठन और एक राजनीतिक दल में एकत्र होना सीखना होगा तथा ऐसा करके दुनिया को दिखाना होगा कि आप लोग अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन नाम से ज्ञात एक संगठन के अधीन एकसूत्र में बंधे हुए हैं। मैं आयोजकों को अपने स्वागत करे लिए धन्यवाद देता हूं।

सभा में से कुछ लोगों ने आग्रह किया है कि मेरा भाषण तमिल में अनुवादित किया जाए। उन्हें आश्वस्त किया गया है कि भाषण का तमिल अनुवाद छापा जाएगा और निःशुल्क बांटा जाएगा।’’

इसके बाद सभा ‘डॉ. अम्बेडकर अमर रहें’ के नारे के साथ विसर्जित हुई। ख्1,

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1 द मेल, 26 सितंबर, 1944