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भारत का इतिहास बौद्ध धर्म और ब्राह्मण-धर्म के संघर्ष के
अलावा अन्य कुछ नहीं है
मद्रास में ठहरने के दौरान डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को कई संस्थाओं ने भाषण
के लिए आमंत्रित किया था। मद्रास रैशनल सोसाइटी भी ऐसी ही एक संस्था थी।
उसने ‘रैशनलिज्म इन इंडिया’ पर डॉ. अम्बेडकर का भाषण, रविवार 24 सितंबर, 1944
को प्रभात टाकीज, ब्रॉडवे, मद्रास में पूर्व मंत्री रामनाथन की अध्यक्षता में आयोजित
किया गया। इस मौके पर साऊ एम.एम. मुथु ने डॉ. अम्बेडकर का स्वागत किया। ख्1,
डॉ. अम्बेडकर ने कहा -
‘‘भारत में ‘रैशनलिज्म’ अर्थात तार्किकता का विषय निःसंदेह भारतीयों के
लिए बड़ी रुचि का विषय है और इसका ठोस प्रभाव पड़ा है। इसलिए जहां तक
हिंदू समाज और सामाजिक जीवन का संबंध है, यह विषय पूरी तरह उपेक्षित रहा
है। भारतीय इतिहास के बारे में अनेकानेक मिथ्या धारणाएं हैं, जिन्हें उन लोगों को
खरीदने के लिए प्रचारित किया गया है जो साहित्य जगत में बहुत बड़े आधिकारिक
विद्वान हैं। भारतीय इतिहास के अत्यंत पारंगत लेखकों का कहना है कि भारत में
कोई राजनीतिज्ञ है ही नहीं और समस्त प्राचीन भारतीय लेखक स्वयं दर्शन, धर्म,
आध्यात्म से सरोकार रखते थे और उन्होंने राजनीति की कभी चिंता ही नहीं की।
यह कहा गया है कि प्राचीन भारत के लोग कभी भी इतिहासवेत्ता या राजनीतिज्ञ
वर्ग के नहीं रहे हैं। आज तक भी यही राय कायम है। यह भी कहा गया है कि
भारत का कोई इतिहास नहीं रहा है, हालांकि भारतीय जीवन और समाज एक पुराने
कठोर सांचे में आगे बढ़ा है, वह एक बार स्थिर हो गया और उसी तरह चलता रहा।
परिणामस्वरूप, भारत के इतिहास -कारों को कुछ नहीं करना होता है, बल्कि यही
बताना होता है कि वह कठोर सांचा क्या है। यह भी कहा गया है कि, कुछ देशों के
बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने पिछली राजनीतिक क्रांति की रूपरेखा
को बदलने के उद्देश्य से कुछ विशेष और राजनीतिक क्रांतियां की हैं।
‘‘मैं केवल एक राजनेता रहा हूं और मैं साहित्य का या इतिहास का
या दर्शन का गंभीर विद्यार्थी होने का दावा नहीं कर सकता। लेकिन मैंने प्राचीन
1 खैरमोड़े खंड 9, पृष्ठ 376