94. 24.9.1944 भारत का इतिहास बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म के संघर्ष के अलावा अन्य कुछ नहीं है। - Page 343

322 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इतिहास के अध्ययन के लिए अपना कुछ समय निकाला है और मैं अनेक विद्वानों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों से प्रतिकूल निष्कर्षों पर पहुंचा हूं। अपने अध्ययन से मुझे ज्ञात हुआ कि प्राचीन भारतीयों में राजनीतिज्ञों की एक परंपरा थी जो इतिहास में उल्लिखित है। यों प्राचीन अतीत में किसी भी देश में ऐसी क्रांति नहीं हुई, जिसने समाज के आचार-नियमों, शासन और दर्शन को प्रभावित किया हो और जिन पर भारतीयों का विशेषाधिकार सिद्ध हो सके। संभवतः भारत एक ऐसा देश रहा है जिसने तार्किकता का उपदेश दिया है और वह भी ऐसा, जो विश्व ने पहले कभी नहीं देखा। भारत एक क्रांति भूमि भी रही है, और इसकी तुलना में फ्रांस की क्रांति केवल ‘बागाटैला’ कही जाएगी, इसके अधिक कुछ नहीं।

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मेरे निर्णय के अनुसार, भारतीय इतिहास के छात्रों को एक बात ध्यान में राखना आवश्यक है और वह बात ऐसी है, जिसे उन इतिहासकारों ने हमेशा उपेक्षित किया है, जिन्होंने भारत के इतिहास पर लिखा है। यह एक मूल बात है और जब तक उसे ध्यान में नहीं रखा जाएगा, तब तक कोई भी भारत के इतिहास को समझ नहीं सकता। मूल तत्व यह है कि प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म (सनातन धर्म) के बीच बड़ा संघर्ष रहा है। यदि इस बड़े संघर्ष को इसमें से निकाल दिया जाए, तो भारत का इतिहास कुछ नहीं बचेगा। यह एक संघर्ष भी नहीं था जैसा कि दर्शनशास्त्र के प्रोफेसरों ने बार-बार कहा है, बल्कि किसी पंथ के बारे में झगड़ा था। यह विचारधारा की क्रांति नहीं थी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दर्शन की क्रांति थी। बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म में झगड़ा एक ही मुद्दे पर था और वह मुद्दा था - ‘सत्य क्या है’? या ‘किसे सत्य माना जा सकता है’? तार्किकता इसी प्रश्न की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालती है। सत्य क्या है, इसके बारे में बुद्ध ने जो उत्तर दिया था वह उससे मूलतः भिन्न था जो ब्राह्मणों ने दिया था। बुद्ध ने कहा था कि सत्य ऐसी चीज है जिसकी साक्षी दस इंद्रियों में से कोई भी इंद्रिय हो सकती है। सत्य के बारे में ब्राह्मणों की विचारधारा यह थी कि यह ऐसी कोई चीज है जिसे वेदों द्वारा घोषित किया गया है (हंसी की लहर)। उन्हें कोई गलती नहीं करनी चाहिए बल्कि ब्राह्मण धर्म का यही सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। बौद्ध क्रांतिकारी थे और ब्राह्मण क्रांति विरोधी। बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म में यही अंतर था। प्राचीन काल से ही ब्राह्मण यह आग्रह करते थे कि वेद समस्त सामाजिक और धार्मिक सिद्धांतों के निर्णायक समादेश माने जाएं। यह बात समझना कठिन है। लेकिन मुझे आश्चर्य है कि प्राचीन ब्राह्मणों जैसे चालाक लोगों ने ऐसे ग्रंथों को इतना असीम पावन और प्रमाण बनाने का आग्रह किया है। इन ग्रंथों में मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है।