328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पाएगा, तो मैं नहीं समझता कि मुझे विद्रोही या बहुत कठोर माना जाएगा।’’
यह बताने के बाद कि पहले की अपेक्षा आज कल सरकार शिक्षा पर ज्यादा
खर्च कर रही है। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि इस गिरावट का एक कारण है कि छात्र पढ़ाई से ज्यादा राजनीति में रूचि लेते हैं। उनके अनुसार, उनकी शिक्षा का अभिशाप यही है। वह कुछ राजनेताओं की राय से असहमत थे कि राजनीति छात्रों की गतिविधियों का विधि सम्मत लक्ष्य है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी फेडरेशन की गतिविधियों की आलोचना करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि फेडरेशन की वे सब परिचर्चाएं, जिन पर प्रेस में बहुत महत्व देकर छपा है या फेडरेशन जो यह सब कर रहा है वह कांग्रेस के संकल्पों को घिसे पिटे तरीके से समर्थित करना ही है। उन्हें उनकी चर्चाओं में कोई मौलिकता दिखाई नहीं पड़ी।
अनुसूचित जातियों के छात्र क्या करें? इस बारे में अपने सुझाव देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि उनकी सलाह है कि वे एक अलग संगठन बना लें, क्योंकि वह चाहते थे कि वे अपने आपको राजनीति से दूर रखें। उन्होंने कहा था कि यह आवश्यक है कि वे स्वयं को अखिल भारतीय विद्यार्थी फेडरेशन से अलग कर लें और उन समस्याओं से ताल्लुक रखें, जो छात्रों की जिन्दगी से संबंध रखती हैं। वह चाहते थे कि छात्र स्वयं उन समस्याओं से सरोकार रखें, जो उनकी पढ़ाई के दौरान उनके सामने आती हैं। इस संबंध में उन्होंने कहा कि उन्होंने सुना है कि एक प्राइवेट कालेज में अनुसूचित जातियों की आर्थिक या सामाजिक कठिनाइयों को ध्यान में नहीं रखा गया। उनके दाखिले के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई और छात्रवृत्ति के विषय में भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई। उनकी टिप्पणी थी, ‘सभी छात्रों के साथ, चाहे गरीब हों या अमीर, राजा हो या रंक, एक-सा बर्ताव किया जाए।’
यदि अनुसूचित जातियों के विद्यार्थियों का कोई अखिल भारतीय संगठन होता, और उसने उनकी कठिनाइयों के आवश्यक आंकड़े संगृहित कर लिए होते तो वे देश में सरकार को या शासक तत्वों को मजबूर कर देते कि वे उन्हें इस विषय में विचार करने देने की अनुमति के लिए सम्यक् प्रावधान करें। डॉ. अम्बेडकर ने छात्रों को सलाह दी कि वे केवल डिग्रियां हासिल न करें बल्कि यह भी देखें कि डिग्री के साथ-साथ कुछ ठोस ज्ञान या उपलब्धि भी उन्हें प्राप्त हो, उनकी अर्हताएं ऐसी हों जिन्हें वे उत्कृष्ट कहें। वे शिक्षा को एक गंभीर विषय मानें न कि हल्की फुल्की मौज-मस्ती।
विद्यार्थियों से एक अखिल भारतीय संगठन बनाने की मांग दुहराते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि उनमें अभी राष्ट्रीय स्तर की जागरूकता नहीं आई है। अभी तक वे प्रादेशिक जिन्दगी जी रहे हैं। ख्1,
1 द पीपुल्स हेराल्ड, 10 जनवरी, 1945.