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आदिम जनजातियों के लिए एक कानूनी आयोग होना चाहिए
अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन का दूसरा सम्मलेन 5 और 6
मई, 1945 को मुंबई में हुआ था। यह सम्मेलन आठ करोड़ अछूतों की समस्याओं
को समझने के लिए ऐसे समय महत्वपूर्ण था, जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर
पर भारी मात्रा में गतिविधियां चल रही थीं। पूरे भारत से लगभग 1,000 प्रतिनिधियों
ने इस सम्मेलन में भाग लिया था। इनमें से लगभग 500 प्रतिनिधि अकेले नागपुर
से आए थे, जिनमें 50 से अधिक स्त्रियां थीं, जबकि लगभग 200 प्रतिनिधि गुजरात
से आए थे। इन प्रतिनिधियों के ठहरने का इंतजाम परेल में नगरपालिका विद्यालय
में किया गया था।
यह सम्मेलन परेल के एक विशाल मैदान, ‘नरेपार्क’ में आयोजित किया
गया था जिसका नाम साध्वी रामाबाई अम्बेडकर नगर रख दिया गया। मैदान लोगों
से खचाखच भरा था। हालांकि एक रुपए प्रति व्यक्ति टिकट रखा गया था, फिर
भी 50,000 से अधिक लोग उसमें आए थे, जिसमें से 5,000 से अधिक महिलाएं थीं,
जिन्होंने खुले अधिवेशन में भाग लिया था। उस समय लगभग दो से ढाई लाख
अछूत परिवार मुंबई में रहते थे और इन परिवारों में से कम से कम 50 प्रतिशत
परिवारों से कम से कम एक व्यक्ति ने इस सम्मेलन में भाग लिया था, जिनमें से
बहुत से वृद्धजन थे, बहुतों की गोद में छोटे बच्चे भी थे।
शुरू में सम्मेलन अप्रैल, 1945 के अंतिम सप्ताह में केवल मुंबई अनुसूचित
जाति फेडरेशन के लिए रखा गया था, लेकिन जब श्री एस.बी. जाधव, सचिव, मुंबई
अनुसूचित जाति फेडरेशन, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर से मिलने दिल्ली गए तो उन्होंने
इस सम्मेलन का स्वरूप बदलने की सलाह दी और कहा कि इसे मुंबई तक सीमित
रखने के बजाए, अखिल भारतीय स्तर का बनाया जाए। सभी 20 समिति सदस्यों
ने परिश्रम किया और थोड़े ही समय में इसकी सदस्यता 6,000 से बढ़कर 20,000
हो गई।
सम्मेलन 5 मई, 1945 अर्थात् शनिवार की शाम शुरू हुआ था। मैदान के एक
कोने में एक विशाल मंच तैयार किया गया था। इस मंच के मध्य में गौतमबुद्ध का
एक विशाल चित्र, सुसज्जित वंदनवार के साथ लगाया गया था, क्योंकि अछूत लोग