101. 6.5.1945 आदिवासी जनजातियों के लिए एक कानूनी आयोग होना चाहिए। - Page 359

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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ए.बी. ठक्कर को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का पत्रोत्तर

सेवा में,

संपादक,

टाइम्स ऑफ इंडिया

महोदय,

क्या आप कृपया मुझे श्री ठक्कर के पत्र का उत्तर देने के लिए अपने अखबार में जगह देंगे, जो टाइम्स ऑफ इंडिया के आज के अंक में छपा है, जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिक समझौते के मेरे प्रस्तावों की आलोचना की है। श्री ठक्कर ने आदिवासी जनजातियों की ओर से डंडा उठा लिया है और मुझ पर अभियोग लगाया है कि मैंने अपना प्रस्ताव पेश करने में इन जनजातियों की मांग की पूर्णतया अवहेलना की है। श्री ठक्कर ने मुझे ‘उत्पीडि़तों और दलितों का साहसी चैम्पियन’ बताकर अपनी आलोचना को एक मुद्दा देना चाहा है। मैं श्री ठक्कर को बता दूं कि मैंने दुखी इनसानों का सार्वभौमिक नेता होने का दावा कभी भी नहीं किया है। मेरी अल्प शक्ति के लिए अछूतों की समस्या बहुत बड़ी है और यदि मैं इन अछूतों को उसके चंगुल से और श्री गांधी के चंगुल से बचाने में सफल हो सका, तो मैं बहुत प्रसन्न होऊंगा।

मैं यह नहीं कहता कि दूसरे लक्ष्य इतने श्रेष्ठ नहीं हैं, लेकिन यह जानते हुए कि जिन्दगी छोटी है, कोई एक लक्ष्य को ही पूरा कर सकता हूं और मैंने अछूतों की सेवा से अधिक कुछ करने की कभी महत्त्वाकांक्षा नहीं की है। ये अछूत, जैसा कि श्री ठक्कर का कहना है, आदिवासी जनजातियों द्वारा भी तुच्छ समझे जाते हैं।

खेद की बात यह है कि श्री ठक्कर को मेरे भाषण से ऐसे उद्धरणों के आधार पर आलोचना करनी चाहिए थी, जो अखबारों में छपे हैं। यदि उन्होंने मेरे भाषण का पूरा पाठ पढ़ा होता तो वह समझ जाते कि आदिवासी जनजातियों के लक्ष्य को छोड़ने के बजाय मैंने वह किया, जो मेरे विश्वास के अनुसार बेहतर था और उनके संरक्षण के लिए ज्यादा प्रभावी प्रस्ताव था। मेरे इस प्रस्ताव को विस्तारपूर्वक देने के लिए यहाँ जगह नहीं है और श्री ठक्कर मुझ पर पक्षपात और ओछेपन का इल्जाम लगाने के लिए प्रेस में जाने से पहले आदिवासी जनजातियों के मेरे प्रस्ताव पर विचार करते तो अच्छा होता।

मैंने विधानमंडल में सीट वितरण की योजना में आदिवासी जनजातियों