101. 6.5.1945 आदिवासी जनजातियों के लिए एक कानूनी आयोग होना चाहिए। - Page 360

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को क्यों शामिल नहीं किया, इसका कारण उनके प्रति मेरा विद्वेष नहीं है, बल्कि पूर्णतः मेरे इस विश्वास का कारण है कि इर आदिवासी जनजातियों में अभी तक वह राजनीतिक सामर्थ्य नहीं है जो अपनी निजी भलाई के लि राजनीतिक सत्ता का प्रयोग करने के लिए आवश्यक है। मैं श्री ठक्कर से यह पूछना चाहूंगा कि क्या इन आदिवासी जनजातियों और दूसरों के लिए पेशेवर सामाजिक सेवक के अपने कैरियर के दौरान उन्होंने उनके शिक्षा के स्तर को उठाने के लि कुछ किया है ताकि उन्हें अपनी निजी अवस्था ज्ञात हो सके, सर्वोच्च हिंदू के स्तर तक उठने की महत्त्वाकांक्षा हो सके तथा वे उस साध्य के साधन के रूप में राजनीतिक सत्ता का प्रयोग करने की स्थिति में हो सकें? मेरे विचार में, श्री ठक्कर के कार्य के बारे में यह अत्यंत दुखद टिप्पणी है कि इन 20 वर्षों में वह आदिवासी जनजातियों में से एक भी स्नातक तैयार नहीं कर पाए।

दूसरे, मैं चाहूंगा कि श्री ठक्कर मुझे बताएं कि ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने विधानमंडल में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की बात अचानक सोची है? भारत शासन अधिनियम, 1935 में आदिवासी जनजातियों को दिया गया प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या की तुलना में प्रायः नगण्य है। क्या श्री ठक्कर ने भारत शासन अधिनियम द्वारा कायम की गई इस असमानता के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई? श्री ठक्कर को सप्रू समिति के प्रस्तावों के विरुद्ध क्या कहना है संभवतः श्री ठक्कर को उनके खिलाफ इतना द्वेष नहीं है, जितना मेरे खिलाफ है।

और तीसरे, यदि श्री ठक्कर चाहते हैं कि आदिवासी जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले, बल्कि यह कि उन्हें महत्व भी दिया जाना चाहिए, तो वह जान लें कि यह तभी हो सकता है जब मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व घटाया जाएगा। क्या श्री ठक्कर आदिवासियों के लिए मुस्लिमों के साथ लड़ने के लिए तैयार हैं? श्री ठक्कर अछूतों के प्रतिनिधित्व को कम करके उनके प्रति अपने प्रेम को सिद्ध नहीं करते हैं। श्री ठक्कर अछूतों जैसी कमजोर जाति के खिलाफ अपनी तलवार उठाकर नायक सिद्ध नहीं होते हैं, जिसने अतीत में अपने उचित हिस्से का प्रतिनिधित्व भी प्राप्त नहीं किया है। यदि वह मुस्लिमों को प्राप्त महत्व में से कुछ हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ें, तो वे अपने आपको आदिवासियों का हितैषी और उनके नायक सिद्ध कर पाएंगे। ख्1,

- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर

बम्बई, 17 मई, 1945

1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, 18 मई, 1945