340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्रम सदस्य, भारत सरकार ने तारीख 20 मई, 1945 (रविवार) के बम्बई स्थित ‘कैफे मॉडल’ में मित्रों के एक समूह द्वारा अपने सम्मान में दी गई पार्टी में बोलते हुए कहा था, ‘‘साम्प्रदायिक मसले के सिवाय भारत में विभिन्न पार्टियों में कोई विवाद नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीतिक प्रगति अर्थात् स्वतंत्रता के अंतिम लक्ष्य के बारे में पार्टियों में कोई मतभेद नहीं है।
वर्तमान स्थिति का विवेचन करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि इसका सारांश एक प्रश्न में दिया जा सकता है। ; ‘‘क्या बहुसंख्यक का शासन उचित है?’’ उनका विचार था कि यह गलत है। यह सोचना गलत है कि राज्य की जरूरतें सर्वोपरि हैं, न कि व्यक्तियों की। क्योंकि यह कहना फासिस्ट अर्थात् नाजी विचारधारा के समान है। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्ति का संरक्षण राज्य का मूलभूत सरोकार है और व्यक्ति का उत्पीड़न सहन नहीं किया जा सकता।
इसके बाद उन्होंने कहा कि बहुसंख्यकों को राजनीतिक बहुसंख्यक और साम्प्रदायिक बहुसंख्यक के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। राजनीतिक बहुसंख्यक हमेशा बदलते रहते हैं। इस प्रकार का बहुसंख्यक सह्य है, किंतु उन्होंने कहा कि ‘जन्मजात बहुसंख्यक’ सह्य नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि इस समस्या के निपटारे के लिए उन्हें ‘मात्र बहुसंख्यक’ के सिद्धांत से अलग होना होगा। यदि ऐसा कर दिया गया तो उनके सामने जो समस्या है उसका समाधान मिल जाएगा।
इस सवाल के बारे में कि क्या डोमिनियन स्थिति स्वीकार की जाए या स्वाधीनता, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि यह प्रश्न कोई विवाद का प्रश्न नहीं है। उनका विचार था कि डोमिनियन स्थिति, स्वाधीनता तक पहुंचने का पहला कदम है। व्यक्तिगत तौर पर वह मानते थे कि डोमिनियन स्थिति स्वीकार करना भारत के लिए बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्वतंत्रता लेने का क्या फायदा जिसे वे कायम न रख सकें। उन्होंने कहा कि भारतीयों को दृढ़संकल्प इस बात के लिए उतना नहीं करना चाहिए कि वे अपने आपको ब्रिटिश राज से मुक्त कर ले बल्कि उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद उसे कायम रखने के योग्य होना चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि स्वतंत्र भारत को इन दो महत्वपूर्ण सवालों से