342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्रम सदस्य, भारत सरकार ने 3 अक्तूबर, 1945,
बुधवार की रात को पूना में अपने भाषण में, आरोप लगाया था कि, ‘‘कांग्रेस देश की
वर्तमान समस्याओं में से अनेक का समाधान करने की दिशा में आगे बढ़ने में केवल
इस कारण नाकाम रही है क्योंकि उसके नेताओं ने अज्ञानी रहना पसंद किया और
राजनीतिक अध्ययन करने से इंकार कर दिया।
यह अवसर था, पूना में ‘डॉ. अम्बेडकर स्कूल ऑफ पालिटिक्स’ का उद्घाटन
समारोह जिसमें राजनीति में रुचि रखने वाले अनुसूचित जातियों के छात्र सदस्य
हैं। उसमें डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि इस देश में राजनीति के क्षेत्र में श्री गांधी के
आगमन से पहले दो मुख्य राजनीतिक विचारधाराएं प्रचलित थीं। पहली विचारधारा
का नेतृत्व श्री रानाडे और श्री गोखले करते थे, जिसे उदारवादी विचारधारा कहा
जाता था। दूसरी विचारधारा का नेतृत्व बंगाल के क्रांतिकारियां द्वारा किया गया था।
उनके बारे में महत्वपूर्ण बात यह थी कि दोनों विचारधाराएं ‘सुस्पष्ट और विवेकपूर्ण’
थीं।’’ उदारवादी विचारधारा की सदस्यता की योग्यताएं इतनी ऊंची थीं कि मूर्ख
और विवेकहीन उस संगठन में प्रवेश नहीं पा सकते थे। उनका मानदंड अध्ययन
और ज्ञान था। वही लोग उनके मंच की महत्वाकांक्षा कर सकते थे, जो राजनीति
के महारथी थे।
क्रांतिकारी विचारधारा का मानदंड भी उच्च था। ऐसा कोई आदमी उसका
सदस्य नहीं बन सकता था, जो अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार न हों।
डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि श्री गांधी का संगठन मूर्खों और विवेकहीनों दोनों
के लिए खोल दिया गया था। अध्ययन और ज्ञान की पोषित परंपरा कांग्रेस संगठन
को उपयुक्त नहीं लगती थी। इससे देश के सार्वजनिक जीवन में अनेक दुःखद
घटनाएं घटीं और कांग्रेस किसी भी बड़ी समस्या का समाधान करने में समर्थ नहीं
रही। साम्प्रदायिक प्रश्न एक ऐसा ही प्रश्न था।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि अस्तित्व की लड़ाई में कोई भी संस्था या समाज,
जो समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी विचारधारा में तालमेल करने के लिए
तैयार नहीं हो, जीवित नहीं रह सकता।