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यह भी सच है कि एक समाज जिसने पवित्र माने गए विचारों को विरासत में प्राप्त किया था, समायोजन करने की स्थिति में नहीं था। अंततोगत्वा ऐसे समाज विलुप्त हो गए। डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि उनका अपना पंथ या विचारधारा स्थापित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यदि ऐसी कोई विचारधारा उनके निधन के बाद स्थापित हुई तो उन्हें अफसोस होगा।
राजनीतिक पंथ के निर्माण से उत्पन्न त्रासदियों की उन्हें जानकारी थी। वह महाराष्ट्र में राजनीति के गंभीर छात्र थे और वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि जब नई समस्याएं सामने आईं तो लोग कैसे समितियों में मिले और उन्होंने अपनी कल्पना का प्रयोग किया। स्पष्ट सोचा और वह अनुमान लगाने की कोशिश की, जो श्री तिलक वैसी परिस्थितियों में करते। जिन लोगों का बहुत पहले निधन हो चुका है, उनकी प्रेरणा पर हमेशा निर्भर रहना अस्थिर अस्तित्व जैसा है।
उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे तभी उनका अनुसरण करें जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि वे ठीक थे। बहरहाल डॉ. अम्बेडकर का उस संस्था के उद्देश्य पर प्रभाव था जिसमें राजनीति का अध्ययन विहित किया गया था। वह उन लोगों से असहमत थे जो यह मानते थे कि मनुष्य राजनीतिक प्राणी है पर उन्होंने माना कि मनुष्य को राजनीतिक दृष्टि से जागरूक करने के लिए अत्यंत सुविचारित प्रयत्न करना होगा। ख्1,
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, 4 अक्तूबर, 1945