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मैं अपने लोगां के साथ इस देश के प्रति भी निष्ठावान हूँ
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अनुसूचित जातियों के उद्धारक डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की 55वीं जयंती पूरी दिल्ली में बड़े आनंद और उत्साह के हर्षपूर्ण वातावरण में मनाई गई। चूंकि दिल्ली में सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध है, इसलिए इस वर्ष यह समारोह मनाने के लिए सार्वजनिक सभा का आयोजन छोड़ दिया गया किंतु अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन के महासचिव द्वारा जारी निर्देश के अनुसार फेडरेशन के झंडे सभी महत्वपूर्ण कालोनियों में फहराये गए। अंतरिम सरकार के विधि सदस्य माननीय श्री जे.एन. मंडल के निवास पर भी झंडा फहराया गया। डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर की लंबी आयु के लिए प्रार्थनाएं भी की गईं और अनुसूचित जाति के सभी घरों को रात में रोशनी से सजाया गया।
14 अप्रैल, 1947 की सुबह 1001 रुपए की एक थैली बाबा साहेब को दिल्ली अनुसूचित जाति कल्याण संघ (करोलबाग शाखा) की ओर से भेंट की गई। अनुसूचित जाति फेडरेशन के कुछ सदस्यों द्वारा भी एक अन्य थैली भेंट की गई।
अपने स्वागत सम्मान का उत्तर देते हुए बाबा साहेब ने निम्नलिखित विचार प्रकट किए :-
‘‘यदि मैं आज बम्बई में होता तो अपने लोगों द्वारा घेर लिया जाता। भारी भीड़ से बचने के लिए 13 तारीख को यहां पर जानबूझकर आया क्योंकि मैं शांति और प्रशांति चाहता हूँ।
‘‘एक दृष्टिकोण से जयंतियां मनाना बहत अच्छा नहीं है क्योकि आप जानते हैं कि मनुष्य नश्वर है और एक दिन वह चल बसेगा। ये जन्मदिन यह याद दिलाते हैं कि मनुष्य के जीवन से काफी दिन कम हो गए हैं। निःसंदेह किसी को इन कटौतियों पर खेद नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह स्वाभाविक है कि मनुष्य अपना जीवन बिताये किंतु यदि मनुष्य का जीवन किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए समर्पित है तो वह कुछ विचारणीय बात हो जाती है।
‘‘इस स्थिति पर दृष्टिपात करें। मैं निःसंदेह यह देखकर बहुत खुश हूं कि पूरे भारत में अनुसूचित जातियां अपनी दुर्बलताओं के प्रति इतनी सजग हो गई हैं