352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और इतनी संगठित हुई हैं और अपने जीवन की पूर्णता प्राप्त करने के लिए इतनी कृतसंकल्प हैं कि किसी को भविष्य के लिए निराश होने की जरूरत नहीं है। जो कुछ मैंने एक दिन वायसराय से कहा था, वह मुझे आपको बताने में कोई परहेज नहीं है। मैंने निष्पक्ष कहा था-‘यदि आप मुझे नहीं बुलाते तो मैं आपसे मिलने नहीं आता। मुझे अंग्रेजों के पीछे भागने की कोई इच्छा नहीं है।’ एक समय था जब अंग्रेजों ने अनुसूचित जातियों के कल्याण का ध्यान रखने का उत्तरदायित्व लिया था। मैंने सोचा था कि उस उत्तरदायित्व को कार्यरूप देने के लिए वे कोई विशेष कदम उठाएंगे। यदि अंग्रेज जा रहे हैं तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वे ऐस रक्षोपायों को सुनिश्चित करने के लिए कोई विशेष कदम उठाए बिना जा रहे हैं जैसे हम संविधान में चाहते हैं। यह फैसला करना उनका काम है कि क्या उनकी कार्रवाई ठीक है या नहीं, यह मेरा काम नहीं है। सैकड़ों बार मुझे उन्हें मनाना पड़ा कि उन्हें अछूतों के कल्याण के लिए कुछ करना चाहिए। मैंने कहा था मुझे पक्का विश्वास है कि छह करोड़ अछूतों का भाग्य मात्र इस लिए बंद नहीं हो जाएगा कि अंग्रेज अपना कर्तव्य पूरा करने से इंकार करते हैं। मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि छह करोड़ अछूत बिना किसी सहायता और बिना किसी ताकत के वह सब हासिल कर लेंगे, जो वे चाहते हैं, भले ही ‘श्रम्र सरकार’ उन्हें उनके उचित अधिकार देना नहीं चाहती।
‘‘निश्चय ही आज हम वे पुराने लोग नहीं हैं, जो दूसरों के पीछे चलते थे, जिनमें कोई जागरूकता नहीं थी और न कोई संगठन था। इस देश में हर कोई जानता है कि अब हम एकदम भिन्न लोग हैं। इसलिए हमें और अधिक सामर्थ्य और ताकत पैदा करनी होगी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों हमारा समर्थन प्राप्त करना चाहती हैं और उसके लिए उन्होंने शर्तें रखी हैं। यदि हम इतने सुसंगठित नहीं होते तो ऐसा कभी नहीं होता और मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि दुर्भाग्यवश हमारे मुद्दे को जून, 1948 तक भारत छोड़ने की अंग्रेजों की घोषणा से गहरा धक्का पहुँचा है। मुझे कुछ नहीं पता कि क्या होने वाला है। मैंने कुछ गणना की है, लेकिन मैं फिलहाल वह घोषणा नहीं करना चाहता।
‘‘हो सकता है अंग्रेज यहां नितांत भिन्न परिस्थितियों में रहें लेकिन भारत छोड़ने के अंग्रेजों के फैसले से जनता के सामने कुछ समस्याएं आई हैं, जिनके कारण कुछ हद तक सांविधानिक सुरक्षापायां की हमारी मांग धुँधली पड़ गई हैं मुझे आशा है कि इस मुद्दे के अंधेरे में चले जाने के बावजूद हम ऐसे राजनीतिक रक्षोपाय, जो हमारे लिए आवश्यक हैं, यदि पूरी तरह नहीं, तो कुछ बड़ी मात्रा में प्राप्त करने में कामयाब होंगे।
‘‘मुझे आपको यह बताकर खुशी है कि मूल अधिकारों की रचना की स्थिति में हमें बहुत अधिक मात्रा में सफलता मिली है। मैंने मूल अधिकार उप-समिति के