109. 14.4.1947 मैं अपने लोगों के साथ इस देश के प्रति भी निष्ठावान हूं। - Page 375

354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कोई मुझ पर दोषारोपण नहीं करेगा। किंतु आपको याद होना चाहिए कि लगभग 292 सदस्यों की संविधान सभा में मैं एक अकेला अलग व्यक्ति हूँ। आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई महान आदमी कितना भी बुद्धिमान हो, और बहस करने तथा प्रतिवाद करने की कितनी भी सामर्थ्य रखता हो, आखिर वह है तो एक अकेला व्यक्ति। यदि शेष 291 सदस्य कारण न सुनने के लिए तर्क न सुनने के लिए बल्कि विरोध करने के लिए कृतसंकल्प हैं तो आप 292 की संविधान सभा में मेरी संभावित असहाय स्थिति को भली प्रकार समझ सकते हैं। जहां मैं केवल एक हूँ।

‘‘आशा है कि सद्बुद्धि काम करेगी और हम अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। हमारे लिए महत्वपूर्ण है संगठन। आप भी यह बात याद रखे कि हम अपने सतत प्रयासों से जो भी राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर लें वे केवल एक अवधि के लिए ही होंगे। एक समय आएगा जब ये अधिकार हमारे लिए ही नहीं, बल्कि इस देश में हर आदमी के लिए समाप्त हो जाएंगे। जब ये अधिकार समाप्त हो जाएंगे तो हमें अपने संगठन, अपनी सामर्थ्य और एकता पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसलिए हमें एकजुट रहने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए। (यहां बाबासाहेब ने जय भीम को भेजे गए संदेश का हवाला दिया और उसमें जो कहानी थी उसकी वर्णन किया)

‘‘मैं आपको एक ही संदेश दे सकता हूँ और वह है कष्ट और कष्ट। कष्ट के माध्यम के सिवाय कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता और आप मन छोटा न करें कि कुछ गाँवों में हमारे लोगों ने कष्ट भोग है तथा भारी कष्ट भोग रहे हैं। दृढ़ संकल्प होकर हमें अपना काम करना होगा और संगठित होने का फैसला करना होगा। इस देश में दुःख का कोई डर नहीं होना चाहिए।

‘‘आपसे यह थैली पाकर मैं बहुत खुश हूँ। अब मैं सोच रहा हूँ कि मुझे इन पैसों का क्या करना चाहिए। मैं इन दो में से एक चीज करना चाहता हूँ, एक यह है कि मुझे यह रकम किसी के पास रखनी चाहिए ताकि इसे दिल्ली में क्लब बनाने के प्रयोजन के लिए लगाया जा सके, जिसके लिए मैंने जमीन खरीदने का इंतजाम कर लिया है। हालांकि यह राशि बहुत मामूली है फिर भी हम इस प्रयोजन के लिए और राशि जुटाएंगे। दूसरी चीज यह है कि यह धनराशि उसी सोसाइटी को वापस कर दी जाए, ताकि वे इसे किसी काम में इस्तेमाल कर सकें। (सोसाइटी इसे वापस लेने के लिए राजी नहीं हुई) ठीक है, तब यह क्लब बनाने के लिए संग्रहीत निधि में दी जानी चाहिए।’’ (एफ. ओ. सी.) ख्1,

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1 जय भीम, 25 मई, 1947