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अल्पसंख्यक को हमेशा मनाना चाहिए, उस पर कभी
हुक्म नहीं चलाना चाहिए
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने बम्बई में 25 सितंबर, 1947 को ‘सिद्धार्थ कालेज पार्लियामेंट’ का उद्घाटन किया था।
इस अवसर पर उन्होंने कहा -
‘‘फिलहाल मेरे सामने कोई स्पष्ट कार्यक्षेत्र नहीं है। इसलिए मैं फौजी के तरीके से बोलने की सोच रहा हूँ। यह स्वाधीनता इतनी अचानक आई है कि हमें अपनी शक्तियों को याद करने का समय नहीं मिला और हमें अपनी शक्तियों को व्यवस्थित करने का भी समय नहीं मिला।
‘‘पिछले 50 वर्षों में किए गए वायदों के बावजूद अंग्रेजों ने अनुसूचित जातियों को एक पृथक राजनीतिक सत्ता न मानकर अंत में हमें धोखा दिया है। इस काम में उन्होंने हमारी मदद नहीं की। उन्होंने मुसलमानों और सिखों की मदद की है। इस प्रक्रम पर यह देखना बहुत अजीब लगता है कि अंग्रेजों ने केवल मुसलमानों और सिखों की मदद की, न कि अनुसूचित जातियों की। हमें असहाय छोड़ दिया गया। हमें स्वयं अपनी सामर्थ्य पर निर्भर रहना होगा और जैसा कि आप जानते हैं यह सामर्थ्य भी क्रिप्स तथा शिष्टमंडल में उनके साथी मित्रों, जैसे ब्रिटिश राजनीतिक सर्वेक्षकों की नजर में विभाजित है। वे तथाकथित हरिजन पार्टी नामक पृथक संगठन के कारण यह विभाजन मानते हैं। यह सच है, और वास्तव में था, कि अनुसूचित जाति फेडरेशन अनुसूचित जातियों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था है।
‘‘मुझे यह कहने में प्रसन्नता है कि जब मैं इंग्लैंड में था और मैंने वहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेक नेताओं से विचार-विमर्श किया था, तो स्थायी संसदीय मंत्रियों ने, जो भारतीय स्थिति से रोजाना संपर्क में थे, मेरे इस कथन का पूरी तरह समर्थन किया था कि अनुसूचित जाति फेडरेशन अनुसूचित जातियों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था है। इतना ही नहीं, क्रिप्स और उनके जैसे अनेके लोग मेरे उद्देश्य से आश्वस्त थे, किंतु इसके बावजूद ब्रिटिश प्रतिनिधि- मंडल ने हर चीज उलट दी, क्योंकि वे अपनी सुरक्षा के लिए राजनीतिक फैसला लेना चाहते थे। हालांकि इसमें कोई तथ्य नहीं था और इस प्रकार उन्होंने हमारी कीमत पर राजनीतिक फैसला