364 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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कभी अपना सुधार नहीं कर सका
दिनांक 10 अप्रैल, 1948 को डॉ. बी.आर. अम्बडेकर ने लॉ कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया।
उसने कहा -
‘‘इस पतन का उत्तरदायित्व प्राचीन समाजों की उन असफलताओं में निहित है जिसके अंतर्गत वे अपने ढांचे में सुधार नही ला पाए। कमियों को दूर करने के बजाय उन्होंने मनु जैसे नियम-कानून निर्माताओं द्वारा बनाए कानूनों द्वारा शासित होना स्वीकार किया, जब कि कानून का असली काम समाज के दोषों को सुधारना है।
सभ्यता कभी भी एक सतत प्रक्रिया नहीं रही। ऐसे राज्य और समाज थे जो किसी समय सभ्य थे। कालांतर में कोई ऐसी घटना घटी, जिसके कारण वे समाज नष्ट हो गए। भारत के इतिहास से इसका उदाहरण दिया जा सकता है।
‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है, कि भारत उन देशों में था, जो प्राचीन महान सभ्यता पर गर्व कर सकता है। जिस समय यूरोपवासी प्रायः जंगली और खानाबदोश अवस्थाओं में जी रहे थे, यह देश सभ्यता के सर्वोच्च शिखर पर था। जिस समय यूरोप के लोग केवल खानाबदोश थे, इस देश में संसदीय संस्थाएँ थीं।
‘‘आम आदमी यह समझता है कि आज हमारी संसदीय संस्थाओं ने समस्त संसदीय प्रक्रिया यूरोपीय देशों से, विशेषकर ब्रिटेन से, उधार ली है, लेकिन मैं समझता हूँ कि जो भी व्यक्ति, उदाहरण के लिए विनय-पिटक के पृष्टों का परिशीलन करेगा, वह पाएगा कि ऐसे मत के लिए कोई आधार नहीं है।
‘‘मेज़ पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस’’ में प्रतिपादित कुछ नियम विनय-पिटक के विद्यार्थी के रूप में भारत के लोगों को ज्ञात थे। ऐसा लगता है कि लोग यह सोचते हैं कि यह प्रक्रिया कि संसद में तब तक कोई बहस नहीं हो सकती जब तक कोई प्रस्ताव पेश न किया जाए और तब तक कोई मतदान नहीं हो सकता जब तक