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अनुसूचित जाति फेडरेशन का पांचवा संयुक्त प्रांत सम्मलेन 24 और 25 अप्रैल, 1948 को लखनऊ में आयोजित किया गया था।
इसी जगह पिछले वर्ष लोगों के राजनीतिक अधिकारों एवं समता को स्थापित करने के लिए अनुसूचित जाति फेडरेशन द्वारा एक आंदोलन चलाया गया था। इस आंदोलन में 2000 से अधिक दलित स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया था। इन सबको लखनऊ में गिरफ्तार किया गया था और जेल में डाल दिया गया था। यह संयुक्त प्रांत के अछूतों द्वारा किया गया बहुत बड़ा बलिदान था। इन सब स्त्री-पुरुषों को डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर जो दलितों के उद्वारक थे को देखने और सुनने की उत्कट इच्छा थी। निम्नलिखित भाषण इन्हीं प्रयासों का परिणाम है।
उक्त सम्मेलन श्री गया प्रसाद, महासचिव, बालगोविन्द, कन्हैया लाल सोनकर, बुद्ध दास चौधरी और मेवालाल सोनकर के प्रभाव के कारण सफल हो सका, क्योकि एक लाख से भी अधिक दलित इस सम्मेलन में जमा हुए थे। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन के महासचिव, श्री पी.एन. राजभोज भी इस सम्मलेन में उपस्थित थे। श्री गोपीचंद्र पिपल, अध्यक्ष, संयुक्त प्रांत, समता सैनिक दल, श्री तिलक चंद्र कुरील, अध्यक्ष, संयुक्त प्रांत अनुसूचित जाति फेडरेशन, मुख्य आयोजक थे।
एन.पी. इस सम्मेलन की दो खास बातें थी : (1) सम्मेलन से यह साफ था कि कांग्रेस शासित राज्यों में अछूतों के दुखों का कोई अंत नहीं है, (2) अनुसूचित जाति फेडरेशन ऐसा कोई भी काम करने में संकोच नहीं करेगी, जो अछूतों की प्रगति के लिए आवश्यक है। डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर ने 25 अप्रैल, 1948 (रविवार) को उक्त सम्मलेन को संबोधित किया था। ख्1,
उन्होंने कहा था -
‘‘राजनीतिक सत्ता संपूर्ण सामाजिक प्रगति की कुंजी है और अनुसूचित जातियाँ तभी अपनी मुक्ति पा सकती है, जब वे तीसरे पक्ष के रूप में संगठित होकर
1 जनता, 1 मई, 1948