18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समिति के प्रधान रहे। महिला सभा की स्वागत सभा की अध्यक्षता सौ. शेवंताबाई ओगले ने की जबकि सचिव का दायित्व सौ. तुलसाबाई बन्सोड़, नागपुर, सौ. जयबाई चौधरी नागपुर व सौ. काशीबाई मांडवधरे, अकोला ने संभाला। युवा सम्मेलन की अध्यक्षता अधिवक्ता शिवदयाल सिंह, लखनऊ ने की तथा स्वागत समिति के प्रधान श्री राघवेन्द्र राव बोरकर रहे।
इस काँग्रेस का महत्वः
‘‘अखिल भारतीय दलित वर्ग कांग्रेस‘‘ अधिवेशन ने अछूतों के राजनैतिक उत्थान के लिए एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। प्रथम तो यह अधिवेशन अपने आप में एक पहल भी थी जिसने पूरे अछूत वर्ग को एक झंडे के नीचे संगठित किया। दूसरे यह पहला अवसर था कि अछूत नेताओं ने डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के नेतृत्व को स्वीकार किया और सबने मिलकर संपूर्ण भारत के स्तर पर अपनी राजनीतिक मांगें रखीं। तीसरे, सब अछूतों ने एकमत होकर लन्दन में गोलमेज अधिवेशन के लिए डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को अपना प्रतिनिधि चुना। चौथे, अछूतों की एक अखिल भारतीय संस्था बन गई तथा अंत में अछूतों के लिए एक योजनाबद्ध राजनीतिक जीवन की भी नींव डाली गई।
संक्षेप में, बहिष्कृत भारतीयों की स्वतंत्रता संग्राम का पहला पृष्ठ अछूतों के इस कांग्रेस में लिखा गया। उसके उक्त अधिवेशन में कुल तेरह संकल्प एक ध्वनि से पारित हुए।
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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर एम.ए. पी.एच.डी. डी.एस.सी., बार एट ला, विधायक मुम्बई की अध्यक्षता में हुए अखिल भारतीय दलित वर्ग़ कांग्रेस के 8 अगस्त 1930 के अधिवेशन के पहले सत्र में निम्न दिये संकल्प पारित हुए।
- यह सभा बिना संकोच यह घोषणा करती है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
द्वारा प्रस्तावित स्वतन्त्रता का विचार भारत के हितों के लिए हानिकारक
व विनाशकारी होगी। अतः यह सभा इस प्रस्ताव से दूर रहेगी। इस सभा
के विचार में भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व के अंतर्गत स्वशासित घोषित करना
भारत की वर्तमान स्थिति के अनुरूप होगा।