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नास्तिक लोगों को अष्टांगी पथ ग्रहण कर लेना चाहिए
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25 मई से 6 जून, 1950 तक केंडी (श्री लंका) में वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स’ का सम्मेलन आयोजित किया गया था। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने उस सम्मेलन में भाग लिया।
26 मई, 1950 को 27 देशों के प्रतिनिधि ‘बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान’ विषय पर चर्चा करने के लिए ‘सत्य के मंदिर’ में एकत्र हुए थे। उस सम्मेलन में ‘विश्व बंधुत्व’ विषयक संकल्प पारित किया गया।
तत्पश्चात् डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सम्मेलन को संबोधित किया। ख्1,
डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा -
‘‘मैं एक रुचिबद्ध प्रेक्षक हूँ न कि कोई प्रतिनिधि। मैं यहाँ कुछ अतिगंभीर प्रयोजनों से आया हूँ। शायद आपको मालूम हो कि भारत में ऐसे लोग हैं जो यह सोचते हैं कि समय आ गया है जब भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान करने के प्रयास किए जा सकते हैं, मैं भी उनमें से एक हूँ। मेरे दौरे के निश्चित प्रयोजन ये हैं : पहला- बौद्ध समारोह देखना। धर्मानुष्ठान, धर्म का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। तर्कवादी चाहे जो भी कहें, धर्मानुष्ठान धर्म में एक बहुत आवश्यक चीज है। यहाँ आकर मैंने सोचा कि मैं वह अनुष्ठान देख पाऊ, जो बौद्ध धर्म का अभिन्न अंग है।
दूसरे - मैं यह जानना चाहता हूँ कि बौद्ध धर्म का पालन अपनी पुरातन विशुद्धता में कहाँ तक किया जाता है और बौद्ध धर्म तथा बुद्ध के सिद्धांतों से असंगत आस्थाओं से युक्त अंधविश्वास पर कितनी धूल जमी हुई है।
मेरा तीसरा उद्देश्य यह पता लगाना है कि बुद्ध द्वारा स्थापित भिक्षुओं की व्यवस्था समाज की कितनी सेवा कर रही है और क्या वह व्यवस्था अपने लिए तथाकथित ‘जीवन की शुद्धता’ कायम रखने में लगी हुई है, अथवा क्या यह जनसाधारण की सेवा में लगी हुई है और उसे उस तरह से पूर्ण बनाने के लिए सलाह देती है और उसका निर्माण करती है जिस तरीके से बुद्ध चाहते थे। मैं यह
1 दलित बंधु, 28 मई, 1950