384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जानने का इच्छुक हूँ कि बौद्ध धर्म किस सीमा तक एक सजीव शक्ति है अथवा क्या यह कोई ऐसी चीज है, जो इस तथ्य के कारण विद्यमान है कि इस देश के लोग पारंपरिक अर्थ में बौद्ध हुआ करते थे तथा इसे विरासत में प्राप्त करने के बाद पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते रहते थे। जहाँ तक इस देश का संबंध है, क्या धर्म की गतिशीलता विद्यमान है? क्या धर्म स्थिर है, या इसमें गति है और यह गतिशील है यह पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका अध्ययन करना और देश की नौजवान पीढ़ी की रुचि को देखना है कि किस सीमा तक वे लोग धर्म के लिए अपना समय देते हैं, किस सीमा तक धर्म में उनका विश्वास उन्हें मुक्ति प्रदान करता है (मृत्यु के बाद मोक्ष के सैद्धांतिक अर्थ में नहीं, बल्कि लौकिक जीवन में)। बौद्ध देशों को केवल समर्थन नहीं चाहिए, बल्कि धर्म का संवर्धन चाहिए और बलिदान चाहिए। केवल बुद्ध के संदेश पर व्याख्यान देने के लिए भिक्षुओं को भेजने से लोग, उनकी जीवन शैली स्वीकार नहीं कर पाएँगे।
यदि विश्व शांति से आश्वस्त होना है तो केवल भाषण से काम नहीं चलेगा। जो लोग पंथ के गुणों में विश्वास नहीं रखते, उन्हें इसे स्वीकार करने के लिए मनाया जाना चाहिए। वह प्रकट है कि जिन देशों में बौद्ध धर्म विद्यमान है, उन्हें त्याग करना चाहिए, मिशन स्थापित करना चाहिए, धन एकत्र करना चाहिए ताकि वे केवल उपदेशों का प्रसार करने के काम पर ही आगे नहीं बढ़े बल्कि स्त्री-पुरुषों को अष्टांगी मार्ग ग्रहण करने के लिए प्रेरित करें।’’ ख्1,
1 25 मई से 6 जून, 1950 तक आयोजित सीलोन सम्मेलन :
वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स के प्रथम सत्र की कार्यवाही की रिपोर्ट (बी.ई. 2494).