386 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गायों की बलि देते थे। इस प्रकार वैदिक धर्म में हिंसा को प्रोत्सहान मिला। ब्राह्मण वैदिक यज्ञ अपनाकर ही समाज को संगठित करने में कामयाब रहे। ब्राह्मणों ने भी समाज को चार वर्गों (वर्णों) - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित किया। समाज का चार वर्णों में विभाजन करने से बड़ी असमताएँ पैदा हो गइंर्। उन लोगों का कहना था कि ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ है और शूद्रों का जन्म उनके पैर से। क्या कोई यह मान सकता है कि किसी धर्म का आधारभूत सिद्धांत समाज को बांटना हो सकता है? जो भी हो, ब्राह्मण धर्म ने इसी बात को शाश्वत बनाया। दूसरी ओर समता, बौद्ध धर्म का मुख्य लक्षण है। बौद्ध धर्म सबको विचार की स्वतंत्रता और आत्मविकास की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हिंसा त्यागना भी बौद्ध धर्म का एक अन्य अनिवार्य उपदेश है। बौद्ध धर्म ने देवताओं को मानने के लिए पशुओं की बलि या किसी प्राणी की बलि देकर मोक्ष प्राप्त करना कभी नहीं सिखाया। मैं तो यह कहूँगा कि भारत में बौद्ध धर्म का उदय उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना फ्रांसीसी क्रांति। बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व यह सोचना भी नामुमकिन था कि शूद्र सिंहासन पर बैठ पाएँगे। भारत का इतिहास बताता है कि बौद्ध धर्म के उदय के बाद शूद्रों को सिंहासन पर आरूढ़ देखा गया है। वस्तुतः बौद्ध धर्म से ही भारत में लोकतंत्र की स्थापना और समाजवादी पद्धति का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
‘‘यह बड़ी जटिल समस्या है कि जिस बौद्ध धर्म ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लिया था, वह भारत से कैसे विलुप्त हो गया। 274 ई.पू. तक बौद्ध धर्म की अवस्था के बारे में हमें जानकारी देने के लिए बहुत अल्प सामग्री उपलब्ध है। फिर भी यह देखा गया है कि अशोक के शान काल में बौद्ध धर्म सबसे ज्यादा लोकप्रिय था। यह एक कष्टदायक तथ्य है कि इतना महान और लोकप्रिय धर्म भारत से कैसे विलुप्त हो गया।
‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि 185 ई.पू. जब अंतिम मौर्य सम्राट का उसके प्रधान सेनापति द्वारा कत्ल कर दिया गया, तो बौद्ध धर्म का जोरदार विरोध हुआ। अपने धर्म को बचाने के लिए ब्राह्मणों की यह एक विधिपूर्ण कार्रवाई थी लेकिन खेद की बात है कि इतिहासकारों ने उस घटना को पर्याप्त नहीं दिया। बौद्ध साहित्य का परिशीलन करते समय मैंने पाया कि बुद्ध के 90 प्रतिशत अनुयायी ब्राह्मण थे। ब्राह्मण विचार-विमर्श और बहस के लिए बुद्ध के पास आते थे और जब पराजित हो जाते थे, तब वे बुद्ध के निष्ठावान बन जाते थे और अंततः बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेते थे। बौद्ध साहित्य ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। इसलिए यह कैसे हुआ कि जो बौद्ध धर्म ब्राह्मणों की बहुसंख्या के बीच फला-फूला वह बाद में स्वयं ब्राह्मणों द्वारा नष्ट कर दिया जायेगा।