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तो मेरा वेतन प्रतिमास 5000/- रुपए होता और सेवानिवृत्ति के बाद 1000/- रुपए की पेंशन मिलती, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं राजनीति में चला गया। मेरा जन्म एक अछूत जाति में हुआ है और मैं अपनी जाति के लिए मरूँगा, अतः मेरे समाज का लक्ष्य मेरे लिए सर्वोपरि है। मैं किसी पार्टी या संगठन में शामिल नहीं हुआ। मैं स्वतंत्र रहा। जब मैं कांग्रेस सरकार में था, तो मैं अपने लोगां के प्रति सच्चा रहा। बहुत से लोग सोचते हैं कि मैं कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया हूँ, क्योंकि मैंने कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद स्वीकार कर लिया था। आलोचकों का कहना है कि डॉ. अम्बेडकर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, इसलिए अनुसूचित जाति के लोग अनुसूचित जाति फेडरेशन में क्यों बने रहें। इस बारे में मैंने लखनऊ में स्पष्ट किया था कि मिट्टी और पत्थर दो भिन्न चीज हैं। वे आपस में कभी मिश्रित नहीं हो सकते। पत्थर पत्थर रहेगा, मिट्टी मिट्टी रहेगी। मैं एक चट्टान की तरह हूँ जो पिघलती नहीं, बल्कि नदियों की दिशा बदल देती है। मैं कहीं भी रहूँ, मैं किसी के भी साथ रहूँ मैं कभी भी अपनी पृथक, पहचान नहीं खोऊँगा। यदि कोई मेरा सहयोग मांगेगा तो मैं अच्छे काम के लिए प्रसन्नतापूर्वक सहयोग दूंगा। मैंने अपनी पूरी ताकत से 4 वर्ष तक कांग्रेस के साथ सहयोग किया और अपनी मातृभूमि की सेवा में पूरी निष्ठा से लगा रहा। लेकिन इन सब वर्षों के दौरान कभी कांग्रेस संगठन में शामिल होने की कोशिश नहीं की।
‘‘हम उस पार्टी के साथ हाथ मिलाना चाहते हैं जो हमारे विचार में अनुसूचित जाति के लोगों से सहानूभूति रखते हैं और जो हमारे लोगों की व्यथाओं के दूर करने के लिए प्रयास करेंगे। लेकिन एक भी ऐसी पार्टी नहीं है, जिसे हमारे लोगों सहानुभूति हो सभी स्वार्थी हैं।
‘‘यहां मैं चुनाव के सिलसिले में आया हूं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब तक आप एकजुट नहीं होंगे, तब तक कामयाब नहीं होंगे। कामयाब होने के लिए या तो शक्तिशाली हो या धनवान हो। हमारी सफलता के लिए इनमें से एक अनिवार्य है, लेकिन हमारे पास न तो धन है और न ही बहुमत। मारवाडि़यों और बनियों के पास शक्ति नहीं है, लेकिन उनके पास धन है, इसलिए वे धन से कोई भी चीज खरीद सकते हैं। वे धन से पुलिस एवं न्यायालय को भी खरीद सकते हैं। हमारे लोगों के पास न तो शक्ति है और न ही धन है। गांवों में हमारे लोग कम संख्या में हैं और उन्हें हमेशा सवर्ण हिंदुओं तथा अन्य उच्च सवर्ण लोगों की कृपा पर रहना पड़ता है। हमारे लोगों को सभी प्रकार के दुख दिये जाते हैं और जब वे पुलिस पदाधिकारियों से शिकायत करते हैं तो उन्हें सुना नहीं जाता। जब वे शिकायत करते हैं तो उन्हें गालियां भी दी जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में यदि हमने कोई