400 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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संसदीय लोकतंत्र के असफल होने से विद्रोह, अराजकता और
साम्यवाद का जन्म होगा
दिनांक 28 अक्तूबर, 1951 को पंजाब के जालंधर शहर में डी0ए0वी0 कालेज की छात्र संसद के समक्ष दिये गये अपने भाषण में डा0 बी0आर0 अम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की सरल ढंग से व्याख्या की थी।
उन्होंने कहा :
‘‘प्रधानाचार्य, माननीय प्रेसीडेंट और माननीय स्पीकर महोदय,
‘‘आपने वास्तव में अपनी संसद के विशेष सत्र को संबोधित करने के लिए आमंत्रित करके जो बहुत बड़ा सम्मान मुझे दिया है मैं उसके लिए आपका आभारी रहूंगा। अपने जीवन भर, विषय दर विषय पेशा, दर पेशा रंग बदलता रहा हूँ। मैंने अपना कैरियर इंग्लैंड से लौटने के बाद 1919 में बंबई के गवर्नमेंट कामर्स कॉलेज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में शुरू किया था, लेकिन मैंने शीघ्र ही यह महसूस किया कि सरकारी सेवा ऐसे आदमी के लिए ठीक नहीं है जो जनता की सेवा करना चाहता है। सरकारी सेवक अनुशास ने के नियमों से बंधा होता है। वह सार्वजनिक सेवा के अपने काम में हर कदम पर अवरोध पाता है। इसके बाद मैं इंग्लैण्ड चला गया और बार के लिए योग्यता प्राप्त की। लौटने के बाद मैंने कुछ समय वकालत की और फिर बंबई गवर्नमेंट ला कॉलेज का पद स्वीकार कर लिया। मैं शिक्षण के काम में लौट आया। मैंने ला कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में 5 वर्ष काम किया। इसके बाद जब भारत शासन अधिनियम, 1935 लागू हुआ तो उससे पहली बार लोकप्रिय विधानमंडल अस्तित्व में आए। जब मैंने राजनीति में कूदने की सोची और मैंने नौकरी छोड़ दी तथा राजनीति में आ गया, तब से मैं बराबर वकालत और जनसेवा करता रहा हूँ। इस प्रकार वकालत और जनसेवा मेरे जीवन में वैकल्पिक धाराएं रही हैं और मुझे नहीं पता कि किस धारा पर मेरे प्राणान्त होंगे? क्या ए.सी. पर या डी0सी0 पर?
‘‘मैं पढ़ाई के पेशे का बहुत शौकीन हूँ। मैं विद्यार्थियों को भी बहुत पसंद करता हूँ। मैंने उनके साथ काम किया है। मैंने अपने जीवन में उन्हें व्याख्यान दिये हैं। यह पहला मौका है जब मैं कैबिनेट से त्यागपत्र के बाद छात्रों को संबोधित करने आया हूँ। मैं छात्रों से बात करके बहुत प्रसन्न हूँ। देश का बहुत कुछ भविष्य