125. 28.10.1951 संसदीय लोकतंत्र के असफल होने से विद्रोह, अराजकता और साम्यवाद का जन्म होगा। - Page 423

402 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समुचित नहीं है। उनके लिए यह अपरिचित संस्था है। हमें सीखना होगा, समझना होगा और इसे कामयाब बनाना होगा।

‘‘इस समय संसदीय लोकतंत्र हमारे लिए अपरिचित है। लेकिन एक समय था जब भारत में संसदीय संस्थाएं थीं। प्राचीन काल में भारत बहुत अधिक उन्नत था। यदि आप ‘महापरिनिब्बान’ के सूक्तों को पढें़गे तो आप मेरे मुद्दे के समर्थन में

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पर्याप्त साक्ष्य पाएंगे। इन सूक्तों में लिखा है कि जिस समय भगवान बुद्ध कुशीनगर में मरणासन्न थे, तब इस आशय का एक संकेत मल्लां को भेजा गया था जो उस समय सत्र में बैठे हुए थे। वे लोग संसदीय संस्थाओं को समर्पित थे। जब उन्हें बुद्ध के बारे में संदेश मिला तो उन्होंने निश्चय किया कि वे सत्र को बंद नहीं करेंगे, बल्कि अपना काम जारी रखेंगे और संसद का काम खत्म होने के बाद ही कुशीनगर जाएंगे। हमारे साहित्य में असंख्य इस बात को साबित करते हैं कि संसदीय शासन प्रणाली हमारे लिए अपरिचित नहीं है।

संसदीय प्रक्रिया के बारे में बहुत सारे नियम हैं। साधारणतया ‘मेज पार्लियामेंट्री

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प्रैक्टिस’ का अनुसरण किया जाता है। एक नियम ऐसा है जिसका अनिवार्यतः सर्वत्र

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अनुसरण किया जाता है। और वह यह है कि कोई प्रस्ताव आए बिना कोई चर्चा नहीं हो सकती। यही वजह है कि किसी प्रश्न पर चर्चा नहीं होती। प्राचीन काल में भी हमारे देश में इस नियम का पालन होता था। गुप्त मतदान प्रणाली जो इस समय प्रचलित है वह भी हमारे लिए नई नहीं है। बौद्ध संघों में इसका अनुसरण किया जाता था उनके पास मतपत्र होते थे जिन्हें वे ‘सालपत्रक ग्राहकाज’ कहते थे। दुर्भाग्यवश इस सब अतीत की अच्छी विरासत को हमने खो दिया। भारत के इतिहासकारों को इस सवाल का हल ढूंढना चाहिए कि ये संसदीय संस्थाएं हमारे देश से क्यों गायब हुई। लेकिन मैं देखता हूँ कि वे इसका कारण नहीं ढूंढ सके या ाढूंढ़ना नहीं चाहते। प्राचीन भारत ‘विश्व गुरू’ था। प्राचीन भारत में ऐसी बौद्धि क आजादी थी, जैसी अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती थी। तब यह प्राचीन सभ्यता क्यों गायब हो गयी? भारत क्यों निरंकुश राजाओं के अधीन हो गया। हम संसदीय संस्थाआें के बारे में जानते थे, हम मतों, मतदान समितियां और संसदीय संस्थाओं से संबंधित अन्य चीजों के बारे में जानते थे। लेकिन आज संसदीय शासन प्रणाली हमारे लिए अपरिचित है। यदि हम गांव में जाएं तो देखेंगे कि गांव के लोग यह नहीं समझते कि मत क्या है, पार्टी क्या है? उन्हें यह कोई विचित्र चीज लगती है, कुछ अपरिचित चीज लगती है। इसलिए बड़ी समस्या है कि इस संस्था को कैसे परिरक्षित किया जाए। हमें लोगो को शिक्षित करना होगा, हमें उन्हें संसदीय लोकतंत्र और संसदीय शासन प्रणाली के फायदे बताने होंगे।