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रहा है। चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और स्वच्छ होने चाहिए। लोगों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, कि वे उन लोगों को चुनें जिन्हें वे विधान मंडलां में भेजना चाहते हैं।
‘‘निष्पक्ष और स्वच्छ चुनाव के बारे में क्या हो? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़े व्यापार घराने, इस देश की राजनीति में बहुत बड़ी भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं। इन बड़े व्यापार घरानों की ओर से कांग्रेस को जो धन दिया जाता है, वह एक बहुत खतरनाक चीज है। यदि धनाढय लोग किसी भी राजनीतिक दल के चुनाव कोष में अंशदान करके चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे, तो परिणाम क्या होगा। यदि उनके धन से समर्थित दल सत्ता में आता है तो वे या तो वर्तमान विधान को रूपांतरित करके अथवा सत्तारूढ़ दल को ऐसे ढंग से विधान बनाने के लिए प्रभावित करके जो उनके हितों के लिए लाभप्रद हो, अपने लिए रियायत लेने की स्वभावतः कोशिश करेंगे। सज्जनो, मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या इन परिस्थितियों में ऐसी आशा की जा सकती है कि संसदीय शासन प्रणाली देश का कोई भला करेगी? मैं आपके सामने महाभारत का हवाला देना चाहूंगा। पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध के दौरान भीष्म और द्रोण कौरवों के पक्ष में थे। पांडव सन्मार्ग पर थे, कौरव कुमार्ग पर, यह भीष्म ने स्वीकार किया था। जब किसी ने भीष्म से पूछा कि यदि वह पांडवों को ठीक समझते हैं, तो फिर कौरवों का समर्थन क्यों कर रहे हैं? भीष्म ने इसका उत्तर स्मरणीय वाक्य में इस प्रकार दिया थाः-
‘‘मुझे नमक के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए। यदि मैं कौरवों का अन्न खाता हूँ तो मुझे उनका पक्ष लेना चाहिए, भले ही वे गलत हों।
‘‘आज वही चीज हो रही है। कांग्रेस बनियों, मारवाडि़यों और अन्य लखपतियों की वित्तीय मदद स्वीकार कर रही है। कांग्रेस उनका अन्न खा रही है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि कांग्रेस को हर महत्वपूर्ण मौके पर इन बड़े घरानों का पक्ष लेना होगा।‘‘
‘‘हम यह भी देखते हैं कि सरकारी सेवक चुनावों को उस पार्टी के पक्ष में प्रभावित करते हैं जो उन्हें और उनके आश्रितों को रोटी देती है। डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे व्यक्ति ने हाल ही में दिल्ली में भारतीय जनसंघ के उद्घाटन सत्र में सरकारी सेवकों पर यह खुलकर आरोप लगाया था कि वे कांग्रेस की मदद कर रहे हैं और ऐसा करके वे चुनावों को निष्पक्ष और स्वच्छ नहीं होने दे रहे हैं। इन परिस्थितियों में सज्जनो, क्या आप सोचते हैं कि संसदीय लोकतंत्र के बहुत सफल होने की कोई आशा है?