22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का अध्यक्षीय भाषण, अखिल भारतीय दलित वर्ग अधिवेशन नागपुर, 8 अगस्त, 1930 में उन्होने कहा, :-
बहिनो और भाइयो,
आपने इस महत्वपूर्ण चर्चा में मुझे आमन्त्रित कर और सभापतित्व सौंप कर मेरा मान बढ़ाया; के लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं। यह एक अति असामान्य कठिनाई वाला दायित्व जिससे बचकर भागना कोई विवकेपूर्ण कार्य नही होता, जिस प्रेम भाव से आपने मुझे सौंपा, मैं उसे अपना कर्तव्य मानता हूं। अतः मेरी यह मान्यता है कि इस कठिन घड़ी में हर सामाजिक जन का अपनी सामर्थ्य के अनुरूप बिना किसी हिचक के अपने साथी देश प्रेमियां के सार्वजनिक कार्य के लिए अथक परिश्रम में अपनी शक्ति लगा देने का कर्तव्य बनता है। मैंने भी यह दायित्व स्वीकार कर लिया है। अतः मेरा विश्वास है कि आप सबका समर्थन व सहायता जो मुझे प्राप्त है वह कभी कम नहीं होगा तथा हमारे विश्वसनीय नेताओं की सूझबूझ व गहरे अनुभव का लाभ आप सबको और मुझे मिलता रहेगा। इससे मुझे संबल व प्रोत्साहन मिला है।
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- ‘‘क्या यह संभव है कि भारत की जनता स्वयं में’’ ’’एक संगठित स्वशासित
समुदाय’’ बन जाये? यह प्रश्न आज अस्पष्ट सा उभर रहा है। हम आज
यहां यह परिभाषित करने के लिए इकट्ठे हुए हैं कि दलित वर्ग इस प्रश्न
के बारे क्या धारणा रखता है, क्योंकि यह प्रश्न आज केवल भारतीयों व
ब्रिटिश राज्य के मानस में ही द्वन्द्व नहीं बना हुआ है बल्कि पूरे विश्व में
पूछा जा रहा है। इस प्रश्न का हमारे द्वारा उत्तर इस देश के भविष्य के
लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। देश के भविष्य का फैसला जल्दी होता है
या देरी से या देश का भविष्य बनता है या बिगड़ता है, यह क्षमता हमारे
द्वारा लिए गए निर्णय में होगी। इसलिए मैं यह कहने का साहस जुटा रहा
हूं कि इस प्रश्न को हल्के से न आंकें। गहन विचार के साथ इसके पक्ष व
विपक्ष पर चिन्तन करें। इस डर को मन से निकाल फेंके कि हमारा निर्णय
दूसरों के निर्णय से भिन्न होगा, परन्तु इस पर अवश्य ध्यान दें कि हमारा
निर्णय स्वतंत्र विचार, निष्ठा तथा विश्वास पर आधारित हो।
- आपको विदित है कि इस प्रश्न के दो पहलू हैं। यह निष्कर्ष निकाला गया
है कि यहां भारत के लोग अलग-अलग जातियों में बटे हैं, अलग अलग
धर्मो का पालन करते हैं और भिन्न-भिन्न धार्मिक संस्कार करते हैं, व अलग
भाषाएॅ बोलते हैं और बेमेल अंधविश्वासी धारणाओं में द्वेषपूर्ण सामाजिक प्रथाओं,