5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 45

24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि यदि सब प्रकार की कुल, धर्म, भाषा व संस्कृति में भिन्नता के रहते हुए भी लैटविया, लिथुआनिया, यूगोस्लाविया, इस्टोनिया, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी और रूमानिया स्वशासित समुदाय बनकर रह सकते हैं, तो भारत क्यां नहीं, इस प्रश्न का कोई उत्तर आपके विचार में आता है? मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है और मैं बहुत आशा से उन मित्रों को सुनना चाहूंगा जो इस प्रश्न का उत्तर देने में स्वयं को सक्षम समझते हैं।

  1. मुझे ऐसा लगता है कि किसी देश की भिन्न-भिन्न दिशाओं में बिखरे तत्वों पर यह शर्त थोपना कि पहले वह एकत्रित हों तभी उनको स्वशासित होने का आशीर्वाद मिल सकता है का कभी-कभी विपरीत प्रभाव होता है और हम स्वशासित राज्य बनने, एकबद्ध होने की शक्ति के प्रभाव की उपेक्षा कर देते हैं। ऐसे बहुत कम देश होते हैं जिनकी सीमाओं से सामंजस्य से जुड़े लोग एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति में बंधे हों। परन्तु ऐसे देशों की अधिकता होती है, जहां ऐतिहासिक, भौगोलिक व राजनैतिक कारणों से भिन्न धर्मों, भिन्न भाषाओं व भिन्न संस्कृति वर्गों के लोग एक दूसरे से घुलमिल गये होते हैं। अगर समरसता का सिद्धान्त कड़ाई से ऐसे राष्ट्रों पर लगाया गया होता तो वे राष्ट्र कभी भी स्वशासित राज्य घोषित ही नहीं हो पाते जिसके वे आज उत्तराधिकारी हैं। यह सब कहने के बाद क्या स्वशासित राज्य प्रणाली ने लोगों को एकबद्ध नहीं कर दिया और अगर वे लोग स्वशासित राज्य न बनते तो वे जैसे एक दूसरे से अलग अलग व भिन्न थे वैसे ही आज भी बने रहते। क्या जर्मनी द्वारा स्वशासित संविधान अपनाना व जर्मन साम्राज्य, जर्मन नागरिकों को एकबद्ध करने में एक महत्वपूर्ण कारक नहीं बना? क्या बैवेरियन, प्रशियनज, सैक्सनज व अनके दूसरे जन समूह जो 1870 ई. से पहले पृथक राष्ट्र थे, एकत्रित होकर एक राष्ट्र बन सकते थे, अगर वे एक मिलीजुली सरकार के नियंत्रण में नहीं लाए गए होते? भिन्न व विरोधी विचारधारा के लोगों को एक राष्ट्र में ढालने के लिए साझी सरकार एक बहुत अच्छा उपकरण साबित हो सकता है। परन्तु उदाहरण के लिए जर्मनी तक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। भारत ही क्या इसे सिद्ध नहीं करता? अगर आज भारत में एकता और राष्टी्रयता की जो पनपती भावना है वह निश्चय ही ब्रिटिश राज की भारत पर एक सरकार के कारण ही है। ऐतिहासिक कारणों व तर्क के बल पर कोई भी भारत को स्वशासित राज्य घोषित करने में परिस्थितियों व लोगों की विषमता को बाधक नहीं बता सकता। वास्तव में, अगर भारत में एकता लाने को हम एक आदर्ष